नई दिल्ली। करवा चौथ का पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ निर्जला व्रत रखती हैं। दिनभर उपवास करने के बाद महिलाएं शाम को विधि-विधान से पूजा करती हैं और चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि करवा चौथ पर चंद्रमा की ही पूजा क्यों की जाती है? इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं का विशेष महत्व बताया जाता है।
मन, शांति और प्रेम के प्रतीक हैं चंद्रदेव
ज्योतिषीय मान्यताओं में चंद्रमा को मन, भावनाओं, शीतलता और मानसिक शांति का कारक माना जाता है। करवा चौथ पर चंद्रदेव की पूजा करने के पीछे मान्यता है कि उनकी शीतलता दांपत्य जीवन में प्रेम, मधुरता और संतुलन बनाए रखने का प्रतीक है। महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।
धार्मिक परंपराओं में चंद्रमा को सौम्यता और शांति से भी जोड़ा जाता है। इसी वजह से करवा चौथ की पूजा में चंद्र दर्शन को विशेष स्थान दिया गया है।
रोहिणी नक्षत्र से जुड़ी पौराणिक मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्रदेव की अनेक पत्नियां थीं, जिनमें रोहिणी उन्हें विशेष प्रिय थीं। धार्मिक मान्यताओं में रोहिणी नक्षत्र को चंद्रमा से संबंधित शुभ नक्षत्र माना जाता है। करवा चौथ की पूजा में चंद्रमा और रोहिणी से जुड़ी मान्यताओं का उल्लेख भी मिलता है। हालांकि, रोहिणी नक्षत्र का संयोग हर वर्ष एक जैसा हो, यह आवश्यक नहीं है।
अखंड सौभाग्य की कामना से होती है चंद्रमा की पूजा
हिंदू धार्मिक परंपरा में चंद्रमा को समय के चक्र और प्रकृति के नियमित परिवर्तन से भी जोड़ा जाता है। चंद्रमा की कलाओं में होने वाला बदलाव जीवन की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है। इसी धार्मिक भाव के साथ महिलाएं चंद्रदेव की पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
मान्यता है कि चंद्रमा को अर्घ्य देने और व्रत का पारण करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यह परंपरा पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण के भाव को भी दर्शाती है।
महाभारत काल से भी जुड़ी है व्रत की मान्यता
करवा चौथ से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं में महाभारत काल का उल्लेख भी मिलता है। प्रचलित कथा के अनुसार, जब पांडवों पर संकट आया, तब द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन मांगा। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने उन्हें व्रत और पूजा का महत्व बताया था। हालांकि, द्रौपदी की इस कथा को करवा चौथ की परंपरा से जोड़ने वाले विवरण अलग-अलग धार्मिक आख्यानों में भिन्न रूप में मिलते हैं।
क्या है करवा चौथ नाम का अर्थ?
करवा चौथ नाम दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘करवा’ मिट्टी के छोटे पात्र को कहा जाता है, जबकि ‘चौथ’ का संबंध चतुर्थी तिथि से है। इस पर्व पर करवे में जल भरकर पूजा की जाती है और चंद्रमा के दर्शन के बाद उन्हें अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसी परंपरा के कारण इस त्योहार को करवा चौथ कहा जाता है।
चंद्र दर्शन के बाद खोला जाता है व्रत
करवा चौथ के दिन महिलाएं सुबह सरगी ग्रहण करने के बाद व्रत शुरू करती हैं। दिनभर निर्जला उपवास रखने के बाद शाम को करवा चौथ की कथा सुनी जाती है और पूजा की जाती है। रात में चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें अर्घ्य देकर पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना की जाती है। इसके बाद पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोलने की परंपरा है।
इस प्रकार करवा चौथ पर चंद्रमा की पूजा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, समर्पण और सुखी जीवन की कामना से जुड़ी परंपरा है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व की पूजा-विधि और कथाओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है।

