लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की बढ़ती राजनीतिक सरगर्मी के बीच कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने मछुआरा समाज को कथित तौर पर वोटों की राजनीति करने वाले मौसमी नेताओं से सावधान रहने की नसीहत दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट के जरिए डॉ. निषाद ने कहा कि आजादी के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में मछुआरा समुदाय एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरकर सामने आया है। ऐसे समय में समाज को उन लोगों की पहचान करने की जरूरत है, जो उसके वोटों की कथित तौर पर दलाली करने का प्रयास कर रहे हैं।
डॉ. संजय निषाद ने किसी व्यक्ति का नाम लिए बिना तीखा राजनीतिक हमला बोला और कहा कि कुछ मौसमी नेता अब तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि उन्हें मुंबई में व्यापार करना है, यहां-वहां घूमकर दूसरों की दरी बिछानी है या फिर मछुआरा समाज के वोटों की दलाली करनी है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
मछुआरा समाज बना बड़ी राजनीतिक ताकत
डॉ. निषाद ने कहा कि लंबे समय तक मछुआरा समाज राजनीतिक रूप से बिखरा रहा, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं। उनके अनुसार आजादी के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में मछुआरा समुदाय अपनी एक मजबूत राजनीतिक पहचान और ताकत के साथ खड़ा हो रहा है।
उन्होंने कहा कि समाज की बढ़ती राजनीतिक ताकत को देखते हुए ऐसे लोगों को पहचानना जरूरी है, जो अपने निजी हितों या दूसरे दलों के कथित इशारे पर समाज के वोटों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने समाज से एकजुट रहने और अपने राजनीतिक अधिकारों को लेकर सजग रहने की अपील की।
बिहार का जिक्र कर यूपी में समाज को गुमराह करने का लगाया आरोप
निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने पोस्ट में बिहार का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में मछुआरा समुदाय के वोटों की खरीद-बिक्री के लिए बदनाम और वहां समाज के राजनीतिक उभार को नुकसान पहुंचाने वाले कुछ लोग अब उत्तर प्रदेश में निषाद समाज को गुमराह करने के लिए सक्रिय हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के मछुआरा समाज को बाहरी लोगों या मौसमी राजनीति करने वालों के बहकावे में आने की जरूरत नहीं है। समाज अपनी राजनीतिक ताकत और अपने अधिकारों को अच्छी तरह समझता है।
‘जो चुनाव नहीं जीत सकता, वह राजनीति सिखाने चला है’
डॉ. संजय निषाद ने बिना किसी का नाम लिए तंज कसते हुए कहा कि जो व्यक्ति खुद एक विधानसभा चुनाव जीतने की हैसियत नहीं रखता, वह जेब में नोटों की गड्डी लेकर लाल टोपी और नीली वर्दी पहनकर उत्तर प्रदेश के निषाद समाज को राजनीति सिखाने चला है।
उन्होंने कहा कि मछुआरा समुदाय पैसों पर बिकने वाला समाज नहीं है। मछुआरा समाज भले ही आर्थिक रूप से कमजोर हो सकता है, लेकिन वह अपने स्वाभिमान, सम्मान और अधिकारों का सौदा नहीं करता।
राजनीति और संघर्ष हमारे खून में है
कैबिनेट मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश के मछुआरों को राजनीति सिखाने से पहले समाज के इतिहास और उसके संघर्ष को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीति और संघर्ष मछुआरा समाज के खून में है।
डॉ. निषाद ने कहा कि मछुआरा समाज ने अलग-अलग दौर में मुगलों और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया और देश की आजादी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुसार समाज का इतिहास संघर्ष, स्वाभिमान और अपने अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाने का रहा है।
अधिकार और आरक्षण के बावजूद बिखराव से नुकसान
डॉ. निषाद ने कहा कि संविधान के माध्यम से समाज को अधिकार और आरक्षण मिला, लेकिन आपसी बिखराव के कारण समाज को उसका पूरा लाभ नहीं मिल सका। उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों को अलग-अलग पहचान के नाम पर बांटने की कोशिश की जाती रही है।
उन्होंने कहा कि आज भी केवट, मल्लाह, बिंद और कश्यप जैसे अलग-अलग नामों के आधार पर समाज में भेद पैदा कर उसे एकजुट होने से रोकने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे प्रयासों से समाज को सतर्क रहने की जरूरत है।
‘गरीब हैं, लेकिन स्वाभिमान का सौदा नहीं करेंगे’
डॉ. संजय निषाद ने समाज के लोगों से अपील की कि दूसरे दलों से कथित तौर पर पैसा लेकर उसे समाज के बीच बांटने और वोटों का सौदा करने वालों को पहचानें। उन्होंने कहा कि मछुआरा समाज गरीब जरूर है, लेकिन वह पैसों के बदले अपने स्वाभिमान और अधिकारों को बेचने वाला नहीं है।
उन्होंने कहा कि समाज की एकजुटता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई में समाज को किसी के बहकावे में आने के बजाय अपनी ताकत और हितों को समझते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
पोस्ट के अंत में लिखा ‘जय निषादराज’
अपने सोशल मीडिया पोस्ट के अंत में डॉ. संजय निषाद ने ‘जय निषादराज’ लिखते हुए मछुआरा समाज से एकजुटता बनाए रखने की अपील की। विधानसभा चुनाव की बढ़ती हलचल के बीच उनका यह बयान राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
डॉ. निषाद के बयान से साफ है कि निषाद पार्टी मछुआरा समाज की राजनीतिक एकजुटता, सामाजिक पहचान और अधिकारों के मुद्दे को आगे रखकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।

