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चंपावत का पुराना बालेश्वर मंदिर: पत्थरों की नक्काशी में छिपी सदियों पुरानी शिव भक्ति की कहानी

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चंपावत। देवभूमि उत्तराखंड की पहाड़ियों में स्थित चंपावत इतिहास, संस्कृति और आस्था का अद्भुत संगम है। यहां मौजूद पुराना बालेश्वर मंदिर भगवान शिव के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ प्राचीन वास्तुकला और शिल्पकला का भी शानदार उदाहरण है। सावन के पहले सोमवार पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस ऐतिहासिक मंदिर की भव्यता और धार्मिक महत्व का उल्लेख किया।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा करते हुए कहा कि चंपावत स्थित पुराना बालेश्वर मंदिर भगवान शिव के प्रति आस्था, समृद्ध इतिहास और शानदार वास्तुकला का अद्भुत संगम है। उन्होंने कहा कि मंदिर की पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और प्राचीन कारीगरी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की कहानी बयां करती है।

चंद वंश के समय हुआ था मंदिर का निर्माण

पुराना बालेश्वर मंदिर चंपावत जिले का सबसे कलात्मक मंदिरों में से एक माना जाता है। यह मंदिर पिथौरागढ़ से करीब 76 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर परिसर में बालेश्वर, रत्नेश्वर और चंपावती दुर्गा को समर्पित मंदिरों का समूह है।

इतिहासकारों के अनुसार, इन मंदिरों का निर्माण चंद वंश के शुरुआती राजाओं ने कराया था। मंदिर की संरचना में प्राचीन स्थापत्य कला की झलक साफ दिखाई देती है। मंदिर में बने मंडप, गर्भगृह और छतों पर की गई जटिल नक्काशी आज भी उस दौर की उत्कृष्ट कला का प्रमाण देती है।

पत्थरों पर उकेरी गई कला बताती है प्राचीन गौरव की कहानी

बालेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी पत्थर की नक्काशी है। मंदिर की दीवारों और छतों पर उकेरी गई कलाकृतियां उस समय के कलाकारों की दक्षता और कल्पनाशक्ति को दर्शाती हैं।

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सदियों पुराने इस मंदिर में मौजूद शिल्पकला न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित किए हुए है। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के साथ-साथ मंदिर की वास्तुकला को देखकर भी आकर्षित होते हैं।

नागों की राजधानी से जुड़ी है मान्यता

बालेश्वर मंदिर को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, यह क्षेत्र कभी नागों की राजधानी हुआ करता था। कहा जाता है कि चंपावती नाम की देवी ने इसी स्थान पर भगवान शिव की आराधना की थी।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इसी वजह से इस क्षेत्र का नाम चंपावत पड़ा। बाद में चंद वंश के शासकों ने यहां बालेश्वर मंदिर परिसर का निर्माण कराया और देवी चंपावती को अपनी आराध्य देवी के रूप में स्वीकार किया।

चंपावत में शिव आराधना के कई प्रमुख केंद्र

चंपावत जिले में भगवान शिव को समर्पित कई अन्य प्राचीन मंदिर भी हैं। इनमें क्रांतेश्वर, मानेश्वर, ताड़केश्वर, ऋषनेश्वर, दिक्तेश्वर और मल्लारेश्वर मंदिर प्रमुख हैं।

इसके अलावा पाताल रुद्रेश्वर नाम की प्रसिद्ध गुफा भी धार्मिक आस्था का केंद्र है। सावन के महीने में इन सभी शिवधामों में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ देखने को मिलती है।

पुराना बालेश्वर मंदिर आज भी उत्तराखंड की प्राचीन विरासत, धार्मिक आस्था और स्थापत्य कला का जीवंत उदाहरण बना हुआ है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को भगवान शिव की भक्ति के साथ-साथ सदियों पुराने इतिहास और संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है।

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