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GDP के आंकड़ों पर विपक्षी दलों का हमला: ‘कागजों पर अर्थव्यवस्था मजबूत, लेकिन बेरोजगारी और महंगाई चरम पर’

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नई दिल्ली। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था के 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ने के आंकड़े सामने आने के बाद अब इस पर सियासत भी तेज हो गई है। सत्तापक्ष जहां इसे भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और वैश्विक चुनौतियों के बीच देश की बेहतर स्थिति का संकेत बता रहा है, वहीं विपक्षी दलों ने जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए महंगाई, बेरोजगारी और आम लोगों की आर्थिक स्थिति का मुद्दा उठाया है।

विपक्षी नेताओं का कहना है कि केवल जीडीपी की वृद्धि दर से देश की आर्थिक स्थिति का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि आर्थिक विकास का वास्तविक लाभ आम आदमी की आय, रोजगार और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों में दिखाई देना चाहिए।

सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने बताया जमीनी हकीकत से दूर

समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद ने जीडीपी के आंकड़ों को जमीनी हकीकत से अलग बताया। उन्होंने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था अस्थिर स्थिति में है और आम लोगों की परिस्थितियां ऐसे आंकड़ों में दिखाई देने वाली तस्वीर से अलग हैं।

अवधेश प्रसाद ने देश की विदेश नीति और अर्थव्यवस्था को अमेरिका पर निर्भर होने का आरोप लगाते हुए कहा कि आर्थिक आंकड़ों के दावों और जमीन पर दिखाई देने वाली वास्तविक स्थिति में अंतर है।

सीपीआई सांसद बोले, आम आदमी को कितना फायदा मिला

सीपीआई के राज्यसभा सांसद पी. संतोष कुमार ने भी जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस तरह के आंकड़े सामने आते रहते हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि आर्थिक वृद्धि का फायदा आम आदमी को कितना मिल रहा है।

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उन्होंने महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि आर्थिक विकास का असर आम लोगों के जीवन में किस तरह दिखाई दे रहा है।

संतोष कुमार ने कहा कि यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूत हो रही है तो उसका असर रोजगार, आमदनी और लोगों की आर्थिक स्थिति में भी दिखाई देना चाहिए।

कांग्रेस नेता ने महंगाई को लेकर वित्त मंत्री पर साधा निशाना

पंजाब कांग्रेस एससी विभाग के इंचार्ज सुधीर चौधरी ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर निशाना साधते हुए महंगाई का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि जब रोजमर्रा की जरूरत की चीजों की कीमतें बढ़ रही हैं तो केवल जीडीपी वृद्धि की चर्चा किस हद तक पर्याप्त है।

उन्होंने पेट्रोल, डीजल, चीनी, प्याज और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक विकास के आंकड़ों के साथ महंगाई की स्थिति पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

सुधीर चौधरी ने वित्त मंत्री के पुराने बयान का हवाला देते हुए सरकार से महंगाई को लेकर जवाब मांगा और कहा कि आर्थिक विकास का आकलन आम लोगों की परेशानियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

आप प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने भी आंकड़ों पर उठाए सवाल

आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि के आंकड़े को देखने में अच्छा बताया, लेकिन इसके वास्तविक प्रभाव पर सवाल खड़े किए।

उन्होंने पूछा कि अगर देश में आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है तो इसका असर महंगाई, बेरोजगारी और परिवारों की बचत में क्यों नहीं दिखाई देता। उन्होंने प्याज, चीनी और पेट्रोल की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन वस्तुओं की कीमतों को देखकर आम आदमी की आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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प्रियंका कक्कड़ ने परिवारों की बचत को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने दावा किया कि परिवारों की बचत में गिरावट और बैंक क्रेडिट पर बढ़ती निर्भरता को भी आर्थिक तस्वीर का हिस्सा माना जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या जीडीपी के आंकड़ों में देश के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों की वास्तविक स्थिति पूरी तरह दिखाई देती है।

जीडीपी आंकड़ों पर सरकार और विपक्ष आमने सामने

पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि के आंकड़े ने एक बार फिर देश की अर्थव्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। सरकार और उसके समर्थक इसे आर्थिक मजबूती और विकास की रफ्तार का प्रमाण बता रहे हैं, जबकि विपक्ष का कहना है कि जीडीपी की वृद्धि का लाभ तभी सार्थक माना जाएगा जब रोजगार बढ़े, महंगाई पर नियंत्रण हो और आम परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो।

आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों को लेकर अब राजनीतिक दलों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है। आने वाले दिनों में महंगाई, रोजगार और आम लोगों की क्रय शक्ति के मुद्दे पर यह बहस और तेज होने के आसार हैं।

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भारत की अर्थव्यवस्था की पहली तिमाही की 7.8 प्रतिशत वृद्धि ने जहां आर्थिक मोर्चे पर सकारात्मक संकेत दिए हैं, वहीं राजनीतिक गलियारों में इस आंकड़े की व्याख्या को लेकर मतभेद उभर आए हैं। सत्तापक्ष इसे देश की मजबूत होती अर्थव्यवस्था का प्रमाण बता रहा है, जबकि विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, बचत और रोजमर्रा की कीमतों को आधार बनाकर आर्थिक विकास की वास्तविक तस्वीर पर सवाल उठा रहा है।

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अब बहस केवल जीडीपी की वृद्धि दर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी केंद्र में है कि आर्थिक विकास का वास्तविक लाभ आम नागरिक तक कितनी मजबूती से पहुंच रहा है।

 


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