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आरक्षण में क्रीमी लेयर की बात सामाजिक न्याय और संविधान की मूल भावना के खिलाफ – मायावती

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लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने आरक्षण में क्रीमी लेयर के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के हालिया बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। मायावती ने कहा कि आरक्षण में क्रीमी लेयर की बात करना केवल अनुचित नहीं है, बल्कि यह बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के मानवतावादी संविधान के उद्देश्यों के भी खिलाफ है।

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बसपा प्रमुख ने कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण केवल सरकारी नौकरी या किसी संस्थान में प्रतिनिधित्व का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक मुक्ति और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। उन्होंने कहा कि सदियों से जातिगत भेदभाव और शोषण का सामना करने वाले समाज के लिए आरक्षण सामाजिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था है।

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आरक्षण को आर्थिक स्थिति से नहीं आंका जा सकता

मायावती ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने बयान में कहा कि बहुजन समाज, खासकर एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के लिए आरक्षण सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। उनके मुताबिक जाति आधारित व्यवस्था के कारण सदियों से शोषित, पीड़ित और उपेक्षित रहे वर्गों के लिए यह व्यवस्था बेहद जरूरी है।

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उन्होंने कहा कि जातिवादी द्वेष, शोषण, प्रताड़ना, अन्याय और अत्याचार की स्थिति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ऐसे में आरक्षण की आवश्यकता को केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं देखा जा सकता।

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बसपा प्रमुख ने जोर देकर कहा कि आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक और संवैधानिक समानता सुनिश्चित करना है। उनके अनुसार आर्थिक उन्नति को आरक्षण के औचित्य का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।

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आरएसएस प्रमुख के बयान पर मायावती का तीखा हमला

मायावती ने आरएसएस प्रमुख के उस हालिया बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें आरक्षण के राजनीतिकरण और इसके लाभार्थियों द्वारा स्वेच्छा से लाभ छोड़ने की बात कही गई थी।

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बसपा प्रमुख ने कहा कि आरक्षण को लेकर इस तरह की सोच सामाजिक वास्तविकता को नजरअंदाज करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि आरक्षण के मुद्दे पर ऐसी बातें जातिवादी सोच को बढ़ावा देती हैं और इससे संवैधानिक उद्देश्यों की अनदेखी होती है।

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मायावती ने कहा कि आरक्षण मूल रूप से उन करोड़ों लोगों को समानता और सम्मान का संवैधानिक तथा कानूनी अधिकार देने की व्यवस्था है, जो सदियों से जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता का शिकार रहे हैं।

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जातिगत भेदभाव अभी भी बड़ी चुनौती : मायावती

बसपा सुप्रीमो ने कहा कि जातिवाद का प्रभाव समाज के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी दिखाई देता है। उन्होंने दावा किया कि जातिगत भेदभाव और उससे जुड़ी समस्याएं जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित करती हैं।

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मायावती ने कहा कि जो सामाजिक परिस्थितियां आरक्षण की जरूरत को पैदा करती हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने केंद्र की पिछली और मौजूदा सरकारों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारें इस जमीनी वास्तविकता से अच्छी तरह परिचित हैं।

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एससी और एसटी को क्रीमी लेयर से दूर रखने की पैरवी करे सरकार

मायावती ने कहा कि अगर केंद्र सरकार अपने तर्कों के आधार पर एससी और एसटी वर्ग को क्रीमी लेयर के दायरे से दूर रखने के लिए अदालत में प्रभावी और उचित पैरवी करती है और अपने पक्ष में फैसला हासिल करती है, तो यह संवैधानिक दृष्टि से उचित होगा।

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उन्होंने कहा कि कई बार सरकारों की ओर से कमजोर कानूनी पैरवी या लचर रवैये के कारण महत्वपूर्ण सामाजिक मामलों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते हैं। ऐसे मामलों में सरकार को पूरी गंभीरता और मजबूती के साथ अपना पक्ष अदालत के सामने रखना चाहिए।

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आरक्षण के मुद्दे पर राजनीति बंद करने की अपील

मायावती ने आरएसएस से भी आरक्षण को लेकर राजनीति बंद करने की अपील की। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के संविधान का सम्मान करते हुए आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने वाली किसी भी पहल से बचना चाहिए।

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उन्होंने कहा कि आरक्षण को लेकर किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की वकालत करने के बजाय देश में समानता आधारित समाज व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में काम किया जाना चाहिए।

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समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर

बसपा प्रमुख ने कहा कि भारतीय संविधान का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समानता, सम्मान और न्याय सुनिश्चित करना है। ऐसे में सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना सरकार और सभी संस्थाओं की जिम्मेदारी है।

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मायावती ने कहा कि देश में समतामूलक समाज व्यवस्था की स्थापना संवैधानिक दायित्व है और इस दिशा में सभी पक्षों को सहयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर किसी भी प्रकार की राजनीतिक बयानबाजी के बजाय सामाजिक न्याय और संवैधानिक उद्देश्यों को प्राथमिकता देने की जरूरत है।

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बसपा सुप्रीमो ने दोहराया कि आरक्षण को केवल आर्थिक लाभ की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार यह व्यवस्था सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और असमानता को दूर करने के संवैधानिक प्रयास का हिस्सा है और इसी दृष्टिकोण के साथ इस मुद्दे पर आगे की नीति तय की जानी चाहिए।

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