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शामली के इकराम हत्या कांड में चार भाइयों को उम्रकैद, 30-30 हजार का जुर्माना

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मुजफ्फरनगर। शामली जिले की कोतवाली क्षेत्र के ग्राम बलवा में 14 जुलाई 2014 को पुरानी रंजिश के चलते इकराम की गोली मारकर हत्या के मामले में अपर जिला सत्र न्यायाधीश-7 रितेश सचदेवा की अदालत ने चार भाइयों नवाब, इंसार, कादिर, और इस्लाम, पुत्रगण जमशेद को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

प्रत्येक दोषी पर 30,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। इसके अतिरिक्त, इंसार को शस्त्र अधिनियम के तहत 7 वर्ष की सजा और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।

 

हत्या और पुरानी रंजिश

14 जुलाई 2014 की रात ग्राम बलवा में पुरानी रंजिश के चलते नवाब, इंसार, कादिर और इस्लाम ने इकराम पर गोलीबारी की और जानलेवा हमला किया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। यह घटना शामली कोतवाली क्षेत्र में हुई थी और पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए चारों भाइयों के खिलाफ हत्या और जानलेवा हमले का मुकदमा दर्ज किया।

जांच में पाया गया कि हमले में अवैध हथियारों का उपयोग किया गया, जिसके कारण इंसार पर शस्त्र अधिनियम के तहत अतिरिक्त आरोप लगाए गए।

 

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पुलिस और जांच

घटना के बाद शामली पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की और चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया। प्राथमिकी के आधार पर, पुलिस ने सबूत जुटाए, जिसमें हथियार और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान शामिल थे।

जांच में यह स्पष्ट हुआ कि हत्या का कारण लंबे समय से चली आ रही रंजिश थी, जिसने हिंसक रूप ले लिया। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में ठोस सबूत और गवाह पेश किए, जिसके आधार पर यह सजा सुनाई गई।

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उम्रकैद और जुर्माना

अपर जिला सत्र न्यायाधीश-7 रितेश सचदेवा की कोर्ट में लंबी सुनवाई के बाद चारों भाइयों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत दोषी ठहराया गया। कोर्ट ने प्रत्येक को आजीवन कारावास और 30,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।

जुर्माना न चुकाने पर अतिरिक्त कारावास का प्रावधान भी किया गया। इंसार को शस्त्र अधिनियम के उल्लंघन के लिए धारा 25/27 के तहत 7 वर्ष की सजा और 10,000 रुपये का जुर्माना अलग से लगाया गया।

 

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अभियोजन की भूमिका

शासकीय अधिवक्ता वीरेन कुमार नगर ने अभियोजन पक्ष की ओर से मजबूत पैरवी की। उन्होंने गवाहों के बयान, फोरेंसिक साक्ष्य और पुलिस जांच के आधार पर कोर्ट में यह साबित किया कि चारों भाइयों ने सुनियोजित तरीके से इकराम की हत्या की। उनकी प्रभावी दलीलों ने कोर्ट के फैसले में अहम भूमिका निभाई।

 

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उम्रकैद का मतलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2022 के फैसले के अनुसार, आजीवन कारावास का मतलब दोषी की अंतिम सांस तक सजा है, न कि 14 या 20 साल की कैद। इस मामले में भी कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चारों भाइयों को जीवनभर जेल में रहना होगा, जो गंभीर अपराधों के लिए कड़ा संदेश देता है।

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