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पांच दिन में पांच लावारिस शवों का अंतिम संस्कार: मुज़फ़्फ़रनगर में अलग-अलग थाना क्षेत्रों से मिली थी लाशें, मृतकों के धर्म के अनुसार पूरे विधि-विधान से दी अंतिम विदाई

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मुज़फ़्फ़रनगर। जनपद में पिछले पांच दिनों के दौरान पांच लावारिस शव मिले। पांच अलग-अलग मौतें और पांच ऐसे अंतिम सफर, जिनमें अपनों की जगह क्रांतिकारी शालू सैनी ने परिवार की जिम्मेदारी निभाई। अलग-अलग थाना क्षेत्रों से सूचना मिलने पर शालू सैनी ने पांचों मृतकों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था कराई। मृतकों का जिस धर्म से संबंध था, उसी के अनुसार धार्मिक रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

पांच दिनों में पांच लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कराना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन पांच लोगों की अंतिम यात्रा की कहानी है, जिन्हें विदाई देने के लिए कोई अपना मौजूद नहीं था। किसी के सिर पर हाथ रखने वाला नहीं था तो किसी की अंतिम यात्रा में कंधा देने वाला कोई नहीं था। ऐसे में शालू सैनी ने आगे आकर उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई और सम्मान के साथ उनका अंतिम सफर पूरा कराया।

शालू सैनी का यह प्रयास एक बार फिर समाज के सामने सवाल खड़ा करता है कि क्या किसी इंसान की जिंदगी का अंत इतना अकेला होना चाहिए कि मृत्यु के बाद उसे अंतिम विदाई देने वाला भी कोई न मिले? जिन लोगों को दुनिया लावारिस कहकर छोड़ देती है, उनके लिए शालू सैनी परिवार की भूमिका निभाती हैं।

कोरोना महामारी के दौरान शुरू हुआ उनका यह सेवा अभियान लगातार जारी है। उस दौर में जब लोग संक्रमण के डर से अपनों के शवों के पास जाने से भी घबरा रहे थे, तब शालू सैनी ने बेसहारा और लावारिस मृतकों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह अब तक 6 हजार से अधिक ऐसे मृतकों का अंतिम संस्कार करा चुकी हैं।

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उनकी सेवा अंतिम संस्कार तक ही सीमित नहीं है। पितृपक्ष और श्राद्ध के दौरान भी वह उन दिवंगत लोगों की आत्मिक शांति के लिए हवन-यज्ञ, पिंडदान और धार्मिक अनुष्ठान कराती हैं, जिनकी अस्थियों और स्मृतियों को संभालने वाला कोई नहीं है।

पिछले पांच दिनों में पांच लावारिस शवों को सम्मानजनक अंतिम विदाई देकर शालू सैनी ने एक बार फिर साबित किया कि इंसानियत का रिश्ता खून के रिश्तों का मोहताज नहीं होता। जब अपनों ने साथ छोड़ दिया, तब किसी अनजान ने उनका आखिरी सफर अपना समझकर पूरा कराया।

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