काठमांडू। नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है। अचानक आई बाढ़ ने कई इलाकों में जनजीवन को तहस-नहस कर दिया। बाढ़ के तेज बहाव में बड़ी संख्या में लोग बह गए या लापता हो गए। अब तक इस आपदा में 1,243 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है, जबकि भोटेकोशी नदी के रास्ते और अंडरग्राउंड पावरहाउस की सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश अभी भी जारी है। इस बीच नेपाल में राहत और बचाव अभियान के साथ शवों की पहचान का काम भी चुनौती बना हुआ है।
चार घंटे मलबे में दबी रहीं 97 साल की बुजुर्ग
नुवाकोट के देविघाट में रहने वाली 97 वर्षीय गुना माया बोहरा बाढ़ की भयावहता का दर्दनाक चेहरा बनकर सामने आई हैं। वह नदी किनारे बने बुजुर्ग देखभाल केंद्र की ग्राउंड फ्लोर पर स्थित अपने कमरे में थीं। अचानक नदी का पानी तेजी से बढ़ा और देखते ही देखते देखभाल केंद्र की निचली मंजिल तक पहुंच गया।
बाढ़ के तेज बहाव में गुना माया बहकर एक किनारे तक पहुंच गईं, जहां पानी का बहाव कुछ कम था। इसके बाद वह मलबे के नीचे फंस गईं। करीब चार घंटे तक वह उसी मलबे में दबी रहीं। इस दौरान उनके परिजन लगातार उन्हें बचाने की कोशिश करते रहे।
परिजन जेसीबी लेकर घटनास्थल पर पहुंचे। सेना और पुलिस के जवानों की मदद से मलबा हटाने का अभियान शुरू किया गया। काफी मशक्कत के बाद गुना माया को सुरक्षित बाहर निकाला जा सका।
रेस्क्यू के बाद उनकी हालत ऐसी थी कि वह बहुत कम बोल पा रही थीं। अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद वह बार-बार एक ही सवाल पूछ रही थीं, “पानी ने मुझे क्यों मारा?” उनकी यह बात बाढ़ के कारण पैदा हुए सदमे और भयावह अनुभव को बयां करती है।
लापता लोगों की तलाश बनी सबसे बड़ी चुनौती
नेपाल में बाढ़ के बाद कई इलाकों में राहत और बचाव अभियान लगातार चल रहा है। भोटेकोशी नदी के आसपास और अंडरग्राउंड पावरहाउस की सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश की जा रही है। कई जगहों पर भारी मात्रा में मलबा जमा होने के कारण बचाव दलों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
बाढ़ के पानी के साथ बहकर आए मलबे ने कई इलाकों में रास्ते भी बाधित कर दिए हैं। ऐसे में बचाव दलों के सामने लोगों को सुरक्षित निकालने के साथ लापता लोगों तक पहुंचने की चुनौती बनी हुई है।
अपनों की तलाश में भटक रहे परिवार, प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार की मजबूरी
बाढ़ में बड़ी संख्या में लोग लापता हुए हैं। कई परिवारों को अब तक अपने परिजनों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी है। लगातार तलाश के बावजूद जब अपनों का कोई सुराग नहीं मिला तो कुछ परिवार प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने को मजबूर हो रहे हैं।
परिजनों के लिए यह स्थिति बेहद पीड़ादायक है। एक ओर उन्हें उम्मीद है कि शायद उनके अपने कहीं जीवित मिल जाएं, वहीं दूसरी ओर लंबे समय तक कोई जानकारी नहीं मिलने के कारण उन्हें अंतिम संस्कार जैसी कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है।
नेपाल की मदद के लिए भारत ने बढ़ाया हाथ
भीषण बाढ़ के बाद भारत ने नेपाल की सहायता के लिए राहत और बचाव अभियान में सहयोग बढ़ाया है। भारत की ओर से 19 सदस्यीय फोरेंसिक टीम नेपाल भेजी गई है। यह टीम काठमांडू में नेपाल पुलिस और स्थानीय विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम कर रही है।
फोरेंसिक टीम का मुख्य उद्देश्य बाढ़ में बरामद शवों की पहचान में तकनीकी सहायता देना है। टीम शवों से DNA सैंपल लेने, उनकी जांच करने और लापता लोगों के परिजनों के DNA सैंपल से मिलान कराने में मदद कर रही है।
भारत ने नेपाल के लिए जरूरी दवाओं की पांचवीं खेप भी भेजी है। इसमें पांच टन से अधिक जरूरी दवाएं शामिल हैं। इसके साथ ही भारत की ओर से 11 सदस्यीय स्पेशलाइज्ड रेस्क्यू टीम भी भेजी गई है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस टीम के साथ छह टन से अधिक रेस्क्यू उपकरण भी भेजे गए हैं।
DNA जांच से होगी बुरी तरह क्षतिग्रस्त शवों की पहचान
प्राकृतिक आपदा के दौरान बरामद कई शवों की पहचान करना बेहद मुश्किल हो जाता है। बाढ़ और मलबे के कारण शवों की हालत खराब होने पर पारंपरिक तरीकों से पहचान संभव नहीं होती। ऐसी स्थिति में DNA जांच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
DNA व्यक्ति के शरीर में मौजूद आनुवंशिक जानकारी होती है, जो माता-पिता से प्राप्त होती है। सामान्य तौर पर प्रत्येक व्यक्ति का DNA अलग होता है। इसी वजह से DNA मिलान को पहचान की वैज्ञानिक और भरोसेमंद प्रक्रिया माना जाता है।
फोरेंसिक विशेषज्ञ बुरी तरह क्षतिग्रस्त शवों से हड्डी या दांत जैसे नमूने लेकर DNA निकालते हैं। इसके बाद मृतक के DNA प्रोफाइल का मिलान उसके माता-पिता, बच्चों या अन्य करीबी जैविक रिश्तेदारों के DNA से किया जाता है। मिलान होने पर शव की पहचान की पुष्टि करने में मदद मिलती है।
आपदा के बीच DNA जांच में लग सकता है कई दिन का समय
सामान्य परिस्थितियों में DNA जांच पूरी होने में करीब एक से तीन सप्ताह का समय लग सकता है। हालांकि किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के दौरान बड़ी संख्या में शव और सैंपल मिलने के कारण जांच का काम लंबा हो सकता है।
आधुनिक फोरेंसिक तकनीकों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर कुछ मामलों में 24 से 72 घंटे के भीतर भी शुरुआती रिपोर्ट हासिल की जा सकती है। हालांकि जांच की वास्तविक अवधि सैंपल की स्थिति, प्रयोगशाला की क्षमता और जांच के स्तर पर निर्भर करती है।
AI पर भी उठे सवाल, आपदा प्रबंधन में तकनीक के इस्तेमाल की मांग
नेपाल की बाढ़ के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल और उसकी पर्यावरणीय कीमत को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। नेपाल में डेटा सेंटर स्थापित करने की संभावनाओं के बीच विशेषज्ञों ने AI सिस्टम के लिए जरूरी भारी बिजली और पानी की खपत को लेकर चिंता जताई है।
डेटा सेंटर में बड़ी संख्या में कंप्यूटर और सर्वर लगातार काम करते हैं। इनके संचालन के साथ काफी गर्मी पैदा होती है, जिसे नियंत्रित करने के लिए कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है। इसके लिए बिजली के साथ पानी की भी पर्याप्त जरूरत हो सकती है।
नेपाल जैसे संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्र में डेटा सेंटर स्थापित किए जाने से पहले उनके पर्यावरणीय प्रभाव का व्यापक अध्ययन करने की जरूरत बताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि विकास और तकनीकी विस्तार के साथ पर्यावरणीय संतुलन को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
बाढ़ की चेतावनी से लेकर रेस्क्यू तक AI कितना कारगर?
डेवलपमेंट एक्सपर्ट आशुतोष तिवारी ने आपदा प्रबंधन में AI के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि AI और एजेंटिक AI जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बाढ़ जैसी आपदाओं में रियल टाइम डेटा का विश्लेषण करने, संभावित खतरे की पहचान करने और रेस्क्यू ऑपरेशन को बेहतर बनाने में किया जा सकता है।
मौसम संबंधी आंकड़ों, नदी के जलस्तर, सैटेलाइट इमेजरी और अन्य रियल टाइम जानकारी का विश्लेषण करके संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने में तकनीक मददगार हो सकती है। समय रहते चेतावनी मिलने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत एजेंसियों को बेहतर तरीके से तैयार करने में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
बालेन शाह बोले- जलवायु परिवर्तन का मुद्दा दुनिया के सामने उठाना होगा
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने इस आपदा के संबंध को जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हुए कहा है कि इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने मजबूती से उठाया जाना चाहिए। हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम और प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को लेकर नेपाल लंबे समय से चिंता जताता रहा है।
बाढ़ के बाद सामने आई तबाही ने एक बार फिर आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी तैयारियों पर ध्यान केंद्रित किया है। अचानक आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली, मजबूत राहत नेटवर्क और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
एक आपदा ने छोड़े कई सवाल
नेपाल की इस भीषण बाढ़ ने एक साथ कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हजारों परिवारों पर संकट आया है, सैकड़ों लोग लापता हैं और शवों की पहचान के लिए आधुनिक फोरेंसिक तकनीक की मदद लेनी पड़ रही है। दूसरी ओर राहत और बचाव कार्य के साथ भविष्य में ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए तकनीक और बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणालियों की जरूरत भी सामने आई है।
97 वर्षीय गुना माया बोहरा का मलबे में चार घंटे तक दबे रहना और बचाए जाने के बाद उनका बार-बार पूछना कि “पानी ने मुझे क्यों मारा?” इस त्रासदी की मानवीय कीमत को सामने लाता है। नेपाल में राहत और तलाश अभियान जारी है और लापता लोगों के परिजनों की निगाहें अब भी किसी अच्छी खबर पर टिकी हुई हैं।



