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जन्माष्टमी पर बन रहे हैं शुभ संयोग, निशीथ काल में होगी लड्डू गोपाल की पूजा, राहुकाल में नए काम से बचें

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नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पंचांग का विशेष महत्व माना जाता है। शुभ कार्य शुरू करने, यात्रा करने, निवेश करने, पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान करने से पहले पंचांग देखकर तिथि, नक्षत्र, योग और शुभ-अशुभ समय की जानकारी ली जाती है। हिंदू पंचांग सूर्य, चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों की स्थिति के आधार पर दिन की गणना और धार्मिक मुहूर्त निर्धारित करता है।

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4 सितंबर 2026, शुक्रवार को भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। इसके बाद नवमी तिथि का आरंभ हो जाएगा। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। गृहस्थ लोग शुक्रवार को जन्माष्टमी का व्रत और पूजन करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रात के निशीथ काल में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का विशेष महत्व है।

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आधी रात को होगा लड्डू गोपाल का पूजन

जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए निशीथ काल को विशेष शुभ माना जाता है। 4 सितंबर को निशीथ काल रात 11 बजकर 57 मिनट से शुरू होकर रात 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। इसी अवधि में श्रद्धालु लड्डू गोपाल का विधि-विधान से पूजन कर सकते हैं।

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जन्माष्टमी की रात भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का अभिषेक, श्रृंगार और पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु मध्यरात्रि में भगवान के जन्म का उत्सव मनाने के बाद व्रत का पारण करते हैं।

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सूर्योदय से चंद्रोदय तक जानें दिन का समय

4 सितंबर को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 13 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 6 बजकर 38 मिनट पर होगा। रात में चंद्रोदय 11 बजकर 45 मिनट पर होगा और अगले दिन सुबह करीब 1 बजे चंद्रास्त होगा।

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जन्माष्टमी के दिन चंद्रमा की स्थिति को भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु परंपरा के अनुसार चंद्रमा के दर्शन और पूजा के बाद व्रत से जुड़े नियमों का पालन करते हैं।

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रोहिणी के बाद शुरू होगा मृगशिरा नक्षत्र

पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्य पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र में स्थित रहेगा। वहीं चंद्रमा रात करीब 11 बजकर 4 मिनट तक रोहिणी नक्षत्र में रहेगा। इसके बाद मृगशिरा नक्षत्र का आरंभ होगा।

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ज्योतिषीय मान्यताओं में तिथि के साथ नक्षत्र की स्थिति को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी के आधार पर कई लोग पूजा, धार्मिक अनुष्ठान और अन्य शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त का विचार करते हैं।

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हर्षण योग के बाद बनेगा वज्र योग

4 सितंबर को दोपहर करीब 3 बजकर 44 मिनट तक हर्षण योग रहेगा। इसके बाद वज्र योग शुरू होगा। वहीं अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 1 मिनट से 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा।

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अभिजित मुहूर्त को दिन के प्रमुख शुभ समयों में गिना जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में शुभ कार्य करना अनुकूल माना जाता है।

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रात में अमृत काल का समय 8 बजकर 2 मिनट से 9 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इस अवधि को भी शुभ कार्यों के लिए अनुकूल समय माना जाता है।

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राहुकाल में नए काम शुरू करने से बचें

शुक्रवार को राहुकाल सुबह 10 बजकर 52 मिनट से दोपहर 12 बजकर 25 मिनट तक रहेगा। वहीं गुलिक काल सुबह 7 बजकर 46 मिनट से 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगा। यमगंड काल दोपहर 3 बजकर 31 मिनट से शाम 5 बजकर 5 मिनट तक रहेगा।

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पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार राहुकाल, गुलिक काल और यमगंड के दौरान नए और महत्वपूर्ण कार्य शुरू करने से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि पूजा-पाठ और नियमित धार्मिक गतिविधियों को लेकर अलग-अलग परंपराओं में अलग मान्यताएं हो सकती हैं।

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सिंह राशि में सूर्य, वृषभ में चंद्रमा

पंचांग के अनुसार शुक्रवार को सूर्य सिंह राशि में स्थित रहेगा, जबकि चंद्रमा वृषभ राशि में रहेगा। ग्रहों की स्थिति को ज्योतिष में दिन के फल और शुभ-अशुभ मुहूर्त के आकलन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

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जन्माष्टमी के दिन चंद्रमा की वृषभ राशि में स्थिति और रोहिणी नक्षत्र का संबंध भी धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व रखता है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र से जुड़ा माना जाता है, इसलिए जन्माष्टमी के पूजन में इस नक्षत्र का विशेष उल्लेख मिलता है।

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पश्चिम दिशा में रहेगा दिशाशूल

शुक्रवार को पश्चिम दिशा में दिशाशूल रहेगा। पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार दिशाशूल वाली दिशा में यात्रा करने से बचने की सलाह दी जाती है। यदि किसी कारणवश पश्चिम दिशा की यात्रा करना जरूरी हो, तो मान्यताओं के अनुसार कुछ पारंपरिक उपाय करके यात्रा शुरू की जा सकती है।

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पंचांग धार्मिक और ज्योतिषीय परंपराओं पर आधारित मार्गदर्शन देता है। अलग-अलग पंचांगों, स्थानों और गणना पद्धतियों के कारण मुहूर्त तथा ग्रह-नक्षत्र के समय में कुछ अंतर संभव है। स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के आधार पर भी पंचांग की गणना में बदलाव हो सकता है।

 

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