नई दिल्ली, 25 सितंबर। ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के 12 साल पूरे होने के मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि यह पहल भारत की आर्थिक और औद्योगिक यात्रा में बदलाव का महत्वपूर्ण दौर रही है। उनके मुताबिक, भारत में निर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह अभियान अब ऐसे औद्योगिक तंत्र के रूप में विकसित हुआ है, जिसमें घरेलू उत्पादन, निवेश, नवाचार और रोजगार के साथ भारतीय कंपनियों की वैश्विक बाजार में भागीदारी भी बढ़ी है। ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत 25 सितंबर 2014 को भारत को विनिर्माण, डिजाइन और नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से की गई थी।
राजनाथ सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की विनिर्माण नीति ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर इंडिया और मेक फॉर द वर्ल्ड’ के सिद्धांत पर आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि इसका प्रभाव विशेष रूप से रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में दिखाई दे रहा है, जहां घरेलू कंपनियों, एमएसएमई और स्टार्टअप की भागीदारी बढ़ाने के साथ स्वदेशी तकनीक और उत्पादन क्षमता पर जोर दिया जा रहा है।
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता पर जोर
रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत की रक्षा व्यवस्था मौजूदा जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य की चुनौतियों के लिए भी लगातार मजबूत की जा रही है। उन्होंने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी झलक आसमान, समुद्र और जमीन तीनों क्षेत्रों में देखने को मिलती है।
उन्होंने भारतीय पायलटों द्वारा तेजस लड़ाकू विमान और प्रचंड हेलिकॉप्टर के संचालन का उल्लेख किया। समुद्री क्षेत्र में स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को भारतीय क्षमता का उदाहरण बताया। वहीं, थल क्षेत्र में अर्जुन टैंक और देश में निर्मित धनुष तोप को रक्षा उत्पादन में स्वदेशी क्षमता से जोड़ा।
भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता में हाल के वर्षों में विस्तार हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में स्वदेशी रक्षा उत्पादन करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। इसी अवधि में रक्षा निर्यात भी 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंचा।
तेजस, प्रचंड और ब्रह्मोस से लेकर आकाश तक स्वदेशी क्षमता
राजनाथ सिंह ने भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता का उल्लेख करते हुए आकाश मिसाइल प्रणाली और ब्रह्मोस जैसे स्वदेशी रक्षा प्लेटफॉर्म का उदाहरण दिया। उन्होंने भारत में निर्मित एशिया की सबसे बड़ी हेलिकॉप्टर फैक्ट्री का भी उल्लेख किया।
रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान और छठी पीढ़ी के लड़ाकू जेट बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। आधुनिक युद्ध में तकनीक की बढ़ती भूमिका को देखते हुए सरकार ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, अंतरिक्ष और क्वांटम तकनीक जैसे क्षेत्रों पर भी जोर दे रही है।
रक्षा औद्योगिक गलियारों से बढ़ रहा उत्पादन का दायरा
रक्षा विनिर्माण को देश के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ावा देने के लिए रक्षा औद्योगिक गलियारों का विकास किया गया है। इसके साथ सरकार ने बड़े रक्षा निर्माताओं के साथ स्टार्टअप और एमएसएमई को भी रक्षा नवाचार तथा उत्पादन व्यवस्था से जोड़ने पर जोर दिया है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में विकसित रक्षा औद्योगिक गलियारों में निवेश और उत्पादन गतिविधियों को बढ़ावा मिला है। उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे में अप्रैल 2026 तक 42,057 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव और 4,409 करोड़ रुपये के निवेश के जमीन पर उतरने की जानकारी सरकारी आंकड़ों में दी गई है।
सृजन प्लेटफॉर्म पर 41 हजार से अधिक विक्रेता
राजनाथ सिंह ने घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए सृजन डिफेंस इक्विपमेंट एम्पावरमेंट प्लेटफॉर्म का भी उल्लेख किया। इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से रक्षा निर्माता, एमएसएमई और विक्रेताओं को एक साथ जोड़ा जा रहा है।
रक्षा मंत्री के मुताबिक, प्लेटफॉर्म पर अब तक 41 हजार से अधिक विक्रेता और 2.7 लाख से अधिक उत्पाद सूचीबद्ध किए जा चुके हैं। सरकारी तथ्यों में भी मई 2026 तक सृजन प्लेटफॉर्म पर 41 हजार से अधिक विक्रेताओं और 2.7 लाख उत्पादों के सूचीबद्ध होने की जानकारी दी गई है।
स्टार्टअप और एमएसएमई को रक्षा नवाचार से जोड़ने की कोशिश
सरकार ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में केवल पारंपरिक और बड़े निर्माताओं पर निर्भर रहने के बजाय स्टार्टअप और एमएसएमई की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। रक्षा मंत्रालय के अनुसार सितंबर 2026 में भी एमएसएमई और डीप टेक स्टार्टअप के लिए तकनीकी और वित्तीय प्रवेश बाधाओं को कम करने तथा उन्हें डीआरडीओ की परीक्षण सुविधाओं और सहायता से जोड़ने के लिए नई पहल की गई।
राजनाथ सिंह ने कहा कि घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत बनाने के लिए तकनीक के विकास, अनुसंधान और उद्योग के बीच सहयोग को बढ़ाना जरूरी है। सरकार की कोशिश है कि देश में विकसित तकनीक का इस्तेमाल भारतीय उद्योग बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए कर सके।
मेक इन इंडिया का दायरा रक्षा से आगे भी बढ़ा
सरकारी पृष्ठभूमि दस्तावेज के अनुसार मेक इन इंडिया के 12 वर्षों के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, स्टील, रेलवे और रक्षा समेत कई क्षेत्रों में उत्पादन और घरेलू क्षमताओं का विस्तार हुआ है। इस दौरान निवेश और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पीएलआई, नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम, पीएम गतिशक्ति और इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक जैसी पहलों का भी इस्तेमाल किया गया।
इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मेक इन इंडिया के 12 वर्ष पूरे होने पर कहा कि देश में अधिक उत्पादन, अधिक निवेश और अधिक निर्यात देखने को मिल रहा है और यह बदलाव अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है।
घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने पर फोकस
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए केवल अंतिम उत्पाद का देश में निर्माण पर्याप्त नहीं है। इसके लिए पुर्जों, घटकों, तकनीक और संबंधित सेवाओं की घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना भी जरूरी माना जा रहा है। इसी उद्देश्य से सृजन प्लेटफॉर्म के जरिए छोटे और मध्यम विक्रेताओं को रक्षा उद्योग से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
राजनाथ सिंह के अनुसार, घरेलू उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में भारतीय उद्योग की भागीदारी बढ़ने से रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी क्षमताओं के विस्तार का आधार तैयार हो रहा है। वहीं सरकारी आंकड़ों के अनुसार मई 2026 तक 5,500 से अधिक रक्षा वस्तुओं को स्वदेशीकरण की विभिन्न सूचियों में शामिल किया गया था।
मेक इन इंडिया के 12 साल पूरे होने के साथ सरकार का जोर अब उत्पादन बढ़ाने के साथ तकनीक, नवाचार, घरेलू सप्लाई चेन और वैश्विक बाजार में भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने पर है। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी प्लेटफॉर्म, औद्योगिक गलियारे, एमएसएमई और स्टार्टअप की भागीदारी इसी व्यापक औद्योगिक रणनीति का हिस्सा है।

