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शारदीय नवरात्रि का छठा दिन: मां कात्यायनी की आराधना से दूर होती हैं विवाह बाधाएं, मंदिरों में गूंजे देवी के जयकारे

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नई दिल्ली: शारदीय नवरात्रि के छठे दिन आज शुक्रवार को देशभर में मां दुर्गा के षष्ठम स्वरूप देवी कात्यायनी की विधि-विधान के साथ उपासना की जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना करने से भक्तों को सुख, समृद्धि और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से विवाह की कामना करने वाले युवाओं और युवतियों के लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि सच्चे मन से देवी की आराधना करने से विवाह संबंधी सभी बाधाएं दूर होती हैं और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है। आज सुबह से ही शक्तिपीठों और घरों में विशेष अनुष्ठान और मंत्रोच्चार का दौर जारी है।

अत्यंत दिव्य और तेजस्वी है माता का स्वरूप

पौराणिक कथाओं और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य, प्रकाशमान और तेजस्वी है। देवी सिंह पर सवार हैं और उनके चार हाथ हैं। उनके एक हाथ में अभय मुद्रा और दूसरे हाथ में वरद मुद्रा सुशोभित रहती है, जबकि अन्य हाथों में तलवार और कमल का फूल रहता है। सिंह उनका वाहन है जो शक्ति, साहस और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। उनकी उपासना करने से भक्तों के मन का भय दूर होता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों से मुकाबला करने की आंतरिक शक्ति मिलती है।

महिषासुर वध और महर्षि कात्यायन की तपस्या से जुड़ी कथाएं

धार्मिक कथाओं में मां कात्यायनी के प्रकट होने के दो प्रमुख प्रसंग मिलते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने अपनी शक्तियों का एकीकरण किया, जिससे देवी दुर्गा प्रकट हुईं। महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इनकी पूजा की थी, जिसके कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया। वहीं दूसरी कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन देवी को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री रूप में जन्म लिया। इसके अलावा द्वापर युग में वृंदावन की गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए इन्हीं की आराधना की थी।

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शहद का भोग और पूजन की विशेष विधि

आज छठे दिन के प्रारंभ में श्रद्धालुओं ने प्रातःकाल स्नानादि के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लिया। घर के मंदिरों की सफाई कर मां दुर्गा और देवी कात्यायनी की प्रतिमा स्थापित की गई। धार्मिक परंपराओं के अनुसार मां कात्यायनी को शहद का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ और विशेष फलदायी माना जाता है। इसके अलावा मौसमी फल, मिठाई और सात्विक प्रसाद भी अर्पित किया गया। पूजा के दौरान लाल, पीले या हरे रंग के वस्त्र धारण करने की परंपरा का पालन करते हुए भक्तों ने विधि-विधान से माता की पूजा की।

मंत्र जाप और संध्याकालीन अनुष्ठान

पूजा के दौरान भक्तों ने विशेष रूप से माता के इस शक्तिशाली मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया:

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

दिनभर उपवास रखने वाले श्रद्धालु संध्याकाल में एक बार फिर मां की आरती उतारेंगे और उसके पश्चात फलाहार ग्रहण कर अपना व्रत पूर्ण करेंगे। जानकारों का कहना है कि आज के दिन एकाग्रता और पूरी श्रद्धा के साथ मां कात्यायनी का स्मरण करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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