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वाराणसी संस्कृति संसद में चंपत राय का बड़ा बयान: बोले- गोवा में पुर्तगालियों ने मचाया था कत्लेआम, विदेशी ताकतें युवाओं को गुमराह कर रही हैं

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वाराणसी। सिगरा स्थित रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में आयोजित संस्कृति संसद के दूसरे दिन बुधवार को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने पुर्तगाली शासन के दौरान गोवा में हुए अत्याचारों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि गोवा में पुर्तगालियों ने बड़े पैमाने पर कत्लेआम और अत्याचार किए थे। इस इतिहास को समझने के लिए उन्होंने ‘गोवा इनक्विजिशन’ पुस्तक पढ़ने की सलाह दी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए चंपत राय ने यह भी आरोप लगाया कि विदेशी ताकतें युवाओं को गुमराह कर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करा रही हैं। उन्होंने कहा कि देश को ऐसी ताकतों से बचाने की जरूरत है। उनके मुताबिक, भारत ने इतिहास में कई आर्थिक और राजनीतिक संकटों का सामना किया, लेकिन अपनी मजबूती बनाए रखी।

इतिहास, आक्रमण और भारत की आर्थिक स्थिति पर रखे विचार

चंपत राय ने अपने संबोधन में 12वीं शताब्दी में मोहम्मद गौरी के आक्रमण और पृथ्वीराज चौहान के समय के बाद देश में शुरू हुई पतन की प्रक्रिया का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इसके बाद अलग-अलग शासकों ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए हिंसा और कत्लेआम किए। अंग्रेजों के शासनकाल में भी अत्याचार हुए।

गोवा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां पुर्तगालियों के अत्याचारों का इतिहास मौजूद है और इस विषय को समझने के लिए ‘गोवा इनक्विजिशन’ पुस्तक पढ़नी चाहिए।

उन्होंने आर्थिक इतिहास पर भी अपने विचार रखे। चंपत राय ने कहा कि एक समय दुनिया की अर्थव्यवस्था संकट में थी, लेकिन भारत मजबूती से खड़ा रहा। उन्होंने मौर्य काल की आर्थिक संपन्नता का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर में भारत की समृद्धि आज के अमेरिका जैसी थी।

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सांस्कृतिक चेतना जगाने में संत समाज की भूमिका पर जोर

चंपत राय ने कहा कि सांस्कृतिक चेतना जगाने, राष्ट्रीय एकता मजबूत करने और त्योहारों के प्रति लोगों की घटती रुचि को दूर करने में संत समाज अहम भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि संतों और धर्माचार्यों को समाज में सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाने के लिए आगे आना चाहिए।

मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि भारत लाने की मांग

संस्कृति संसद के दौरान काशी विद्वत परिषद ने लंदन में रखी मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि को भारत लाने की मांग उठाई। परिषद के महामंत्री राम नारायण द्विवेदी ने कहा कि पांडुलिपि भारत आने के बाद उसका वर्तमान में प्रचलित मनुस्मृति के पाठ से मिलान किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि परिषद इस विषय पर संतों और विद्वानों के साथ चर्चा कर रही है। इसका उद्देश्य मूल पाठ और बाद में जोड़े गए अंशों की पहचान करना है।

Gen-Z कॉन्क्लेव में युवाओं की सोच और आंदोलनों पर चर्चा

संस्कृति संसद के दूसरे दिन आयोजित Gen-Z कॉन्क्लेव के पहले सत्र में युवाओं की बदलती सोच, सामाजिक भूमिका और आंदोलनों में उनकी भागीदारी पर विचार-विमर्श हुआ। इसमें शिक्षाविदों, कलाकारों और युवा वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

वक्ताओं ने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में भारतीय युवाओं के व्यवहार और सोच में बदलाव आया है, लेकिन आंदोलनों में युवाओं ने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। सर्वेश तिवारी ने अपने संबोधन में कावा की छवि का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें इसमें किसी बुजुर्ग संन्यासी के बजाय रक्त से लथपथ योद्धा की तस्वीर दिखाई देती है। उन्होंने इतिहास और सभ्यताओं के अस्तित्व को लेकर भी अपनी बात रखी।

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महामंडलेश्वर प्रबोधानंद ने ‘जिहाद’ के मुद्दे पर जताई चिंता

जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर प्रबोधानंद महाराज ने अपने संबोधन में इस्लामिक कट्टरपंथ और सनातन संस्कृति पर कथित हमलों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि दुनिया जिहादी गतिविधियों से परेशान है और सनातन संस्कृति पर लगातार हमले हो रहे हैं। उन्होंने ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि समाज को इन चुनौतियों को समझने और उनका मुकाबला करने की जरूरत है।

उन्होंने घरों में जन्मदिन मनाने के बढ़ते चलन पर भी टिप्पणी की। प्रबोधानंद महाराज ने कहा कि पहले ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा था, फिर ‘हम दो, हमारा एक’ हुआ और अब स्थिति ‘हम दो, हमारा कोई नहीं’ तक पहुंच गई है। उन्होंने जनसंख्या और पारिवारिक संरचना से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी चिंता जाहिर की।

पहले दिन धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर शंकराचार्य ने जताई थी नाराजगी

संस्कृति संसद के पहले दिन मंगलवार को सुमेरु पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री की भगवान राम और श्रीकृष्ण को लेकर की गई टिप्पणी पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि भगवान श्रीकृष्ण और भगवान राम के बीच अंतर बताने वाला व्यक्ति अज्ञानी है। शिव, कृष्ण और राम में कोई अंतर नहीं है।

शंकराचार्य ने कहा था कि किसी कथावाचक को ऐसी टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है, जिससे लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हों। उन्होंने मंदिरों के अधिकार और धार्मिक स्थलों से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी बात रखी थी।

दरअसल, 29 अक्टूबर को मध्य प्रदेश के शिवपुरी में रामकथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने भगवान राम और श्रीकृष्ण की तुलना करते हुए कहा था कि उनके राम सीधे हैं, जबकि कृष्ण टेढ़े हैं। इस टिप्पणी पर विवाद होने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने माफी मांगते हुए स्पष्ट किया था कि भगवान राम और श्रीकृष्ण एक ही हैं तथा उनके बीच कोई अंतर नहीं है।

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स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने दिल्ली को बताया संघर्ष का केंद्र

अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के खिलाफ कई तरह के षड्यंत्र हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली सनातन और भारतीय संस्कृति के खिलाफ संघर्ष का अखाड़ा बन गई है।

उन्होंने कहा कि कुछ व्यक्ति और संगठन लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के बजाय जंतर-मंतर के रास्ते सत्ता बदलने का प्रयास कर रहे हैं। स्वामी जीतेंद्रानंद ने संत समाज से इन परिस्थितियों को समझने की अपील की। उन्होंने Gen-Z के नाम पर युवाओं को बांटने की कोशिशों पर भी सवाल उठाए और युवाओं से समाज तथा राष्ट्र के विकास में योगदान देने का आह्वान किया।

संस्कृति संसद में दूसरे दिन भी देशभर से आए संतों, धर्माचार्यों और विद्वानों ने सनातन संस्कृति, धार्मिक परंपराओं, सामाजिक बदलाव और राष्ट्रीय एकता से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे।

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