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हर कदम पर दर्द… फिर भी नहीं रुका शिवभक्त: आस्था के आगे बेबस हुई मजबूरी! नकली पैर के सहारे पैदल कांवड़ लेकर निकला शिवभक्त, मां के त्याग को समर्पित की कांवड़

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मुज़फ़्फ़रनगर। कांवड़ यात्रा-2026 में जहां अनोखी और आकर्षक कांवड़ें लोगों का ध्यान खींच रही हैं, वहीं शनिवार शाम करीब 5 बजे मुज़फ़्फ़रनगर के शिव चौक पर एक ऐसा शिवभक्त पहुंचा, जिसकी हिम्मत और आस्था ने हजारों लोगों को भावुक और प्रेरित कर दिया। दिल्ली के शाहदरा निवासी मुकेश ठाकुर, जिनका एक पैर कृत्रिम है, हरिद्वार की हरकी पैड़ी से पवित्र गंगाजल लेकर दिल्ली तक पैदल कांवड़ यात्रा कर रहे हैं।

कभी पेशे से ड्राइवर रहे मुकेश ठाकुर वर्ष 2014 में हुए एक सड़क हादसे में अपना दाहिना पैर खो बैठे थे। हादसे के बाद उन्हें कृत्रिम पैर लगवाना पड़ा, लेकिन उन्होंने जिंदगी से हार नहीं मानी। अब वही मुकेश बाबा भोलेनाथ के प्रति अटूट आस्था के साथ कृत्रिम पैर के सहारे सैकड़ों किलोमीटर की कठिन पदयात्रा कर रहे हैं।

शिव चौक पर पहुंचे मुकेश ठाकुर की पीठ पर एक विशेष संदेश वाला बोर्ड भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा। इस संदेश के माध्यम से उन्होंने अपनी कांवड़ यात्रा उस मां के त्याग और ममता को समर्पित की है, जिसने जबलपुर क्रूज हादसे के दौरान अपने बच्चे को आखिरी सांस तक सीने से लगाए रखा। मुकेश का कहना है कि एक मां का प्रेम और बलिदान पूरी मानवता के लिए प्रेरणा है, इसलिए उन्होंने अपनी इस यात्रा को मातृत्व के उस अद्भुत रूप को नमन करते हुए समर्पित किया है।

मुकेश बताते हैं कि कृत्रिम पैर के साथ लंबी दूरी पैदल तय करना बेहद कठिन है। हर कदम पर दर्द होता है, लेकिन बाबा भोलेनाथ की कृपा और आस्था उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है। उन्होंने कहा कि चाहे कितनी भी तकलीफ आए, वह अपनी कांवड़ यात्रा अधूरी नहीं छोड़ेंगे और दिल्ली पहुंचकर पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे।

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उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष भी उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए इसी तरह कांवड़ यात्रा की थी। इस बार उनकी यात्रा केवल भक्ति नहीं, बल्कि समाज को संघर्ष, मातृत्व और कभी हार न मानने का संदेश देने का माध्यम भी बन गई है।

शिव चौक पर मौजूद लोगों ने मुकेश ठाकुर का उत्साहवर्धन किया। कई श्रद्धालुओं ने उनके साथ तस्वीरें खिंचवाईं और उनकी हिम्मत को सलाम किया। उनकी यह यात्रा बता रही है कि यदि संकल्प मजबूत हो, तो शारीरिक सीमाएं भी आस्था और इच्छाशक्ति के सामने छोटी पड़ जाती हैं।

 

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