जयपुर। टीकाकरण का नाम सुनते ही अक्सर छोटे बच्चों को लगाए जाने वाले नियमित टीकों की तस्वीर सामने आती है। आम धारणा यह है कि बचपन में सभी जरूरी टीके लग जाने के बाद टीकाकरण की जरूरत खत्म हो जाती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि टीकाकरण केवल बचपन तक सीमित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवनभर चलने वाली निवारक स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
किशोरावस्था से लेकर वयस्क जीवन, गर्भावस्था और वृद्धावस्था तक शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता और संक्रमणों का जोखिम बदलता रहता है। ऐसे में उम्र, स्वास्थ्य स्थिति, पेशे और जीवनशैली के अनुसार कुछ टीकों की अतिरिक्त खुराक, बूस्टर या कैच अप टीकाकरण की आवश्यकता पड़ सकती है।
भारत में टीकाकरण कवरेज ने बनाई मजबूत स्थिति
भारत ने नियमित टीकाकरण के क्षेत्र में बीते वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 तक देश में पूर्ण टीकाकरण कवरेज 98.4 प्रतिशत तक पहुंच गया। वहीं ऐसे बच्चों का अनुपात जिन्हें एक भी टीका नहीं लगा था, जिसे जीरो डोज बच्चों के तौर पर जाना जाता है, 2023 में 0.11 प्रतिशत से घटकर 2024 में 0.06 प्रतिशत रह गया।
यह उपलब्धि बताती है कि देश में बच्चों तक टीकाकरण पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत हुई है। अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ बचपन में टीकाकरण के साथ साथ किशोरों, वयस्कों, गर्भवती महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों के लिए आवश्यक टीकों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दे रहे हैं।
राजस्थान से शुरू हुआ राष्ट्रीय HPV टीकाकरण अभियान
राजस्थान ने भी बचपन के बाद टीकाकरण के दायरे को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फरवरी 2026 में राष्ट्रीय HPV टीकाकरण अभियान की शुरुआत राजस्थान के अजमेर से की गई।
इस अभियान का उद्देश्य 14 वर्ष की आयु की लड़कियों को सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए HPV वैक्सीन उपलब्ध कराना है। देशभर में लगभग 1.15 करोड़ लड़कियों को सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर यह वैक्सीन निःशुल्क उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
HPV टीकाकरण यह भी बताता है कि टीकाकरण की भूमिका केवल बचपन में होने वाले सामान्य संक्रमणों से सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि आगे चलकर गंभीर बीमारियों के खतरे को कम करने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
बचपन के बाद टीकाकरण क्यों जरूरी है
फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर के कंसल्टेंट इंटरनल मेडिसिन डॉ. अखिल गुप्ता के अनुसार लोगों में अभी भी यह धारणा मौजूद है कि टीकाकरण बचपन में पूरी होने वाली प्रक्रिया है। जबकि उम्र बढ़ने के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में बदलाव आता है और कुछ संक्रमण अधिक गंभीर रूप ले सकते हैं।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि खासतौर पर डायबिटीज या हृदय रोग जैसी पुरानी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों में कुछ संक्रमणों का खतरा और उनकी गंभीरता बढ़ सकती है। ऐसे में अपने पुराने टीकाकरण रिकॉर्ड की समय समय पर डॉक्टर से समीक्षा करवाना नियमित स्वास्थ्य जांच का हिस्सा होना चाहिए।
किशोरावस्था में टीकाकरण की अहम भूमिका
किशोरावस्था शरीर में तेजी से होने वाले बदलावों का दौर है। इस उम्र में HPV के साथ डिप्थीरिया और टिटनेस से बचाव के लिए जरूरी टीकों पर ध्यान देना चाहिए।
यदि बचपन के दौरान हेपेटाइटिस बी, टाइफाइड, MMR या चिकनपॉक्स जैसे टीके किसी कारण से छूट गए हों तो डॉक्टर की सलाह से कैच अप टीकाकरण कराया जा सकता है। छूटी हुई खुराक को लेकर खुद से निर्णय लेने के बजाय पुराने टीकाकरण रिकॉर्ड के आधार पर चिकित्सकीय सलाह लेना अधिक उचित माना जाता है।
गर्भावस्था में मां के साथ शिशु की भी सुरक्षा
गर्भावस्था के दौरान टीकाकरण का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि कुछ टीके मां के साथ उसके होने वाले बच्चे को भी संक्रमणों से बचाने में मदद कर सकते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार गर्भावस्था में Tdap और फ्लू वैक्सीन जैसे कुछ टीकों की आवश्यकता हो सकती है। वहीं कुछ लाइव वैक्सीन गर्भावस्था के दौरान सामान्यतः नहीं लगाए जाते। इसलिए गर्भवती महिला को कोई भी टीका अपनी इच्छा से लगवाने या रोकने के बजाय अपने चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।
वयस्कों को भी जरूरत पड़ सकती है बूस्टर और अन्य टीकों की
वयस्कों में टीकाकरण की जरूरत उनकी उम्र के साथ साथ पेशे, यात्रा, जीवनशैली और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर कर सकती है।
कुछ लोगों को Td बूस्टर, हेपेटाइटिस A और B, HPV या वार्षिक फ्लू वैक्सीन की आवश्यकता हो सकती है। वहीं डायबिटीज और हृदय रोग जैसी स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों के लिए टीकाकरण की जरूरतों की अलग से समीक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है।
यात्रा करने वाले लोगों को भी गंतव्य और यात्रा की परिस्थितियों के आधार पर कुछ अतिरिक्त टीकों की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे मामलों में यात्रा से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उपयोगी रहता है।
वरिष्ठ नागरिकों में संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है
उम्र बढ़ने के साथ प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता स्वाभाविक रूप से प्रभावित हो सकती है। इसके कारण कुछ संक्रमणों का असर वरिष्ठ नागरिकों में अधिक गंभीर हो सकता है।
इन्फ्लूएंजा और न्यूमोकोकल संक्रमण जैसी सांस संबंधी बीमारियां बुजुर्गों के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन सकती हैं। ऐसे में डॉक्टर की सलाह के अनुसार वार्षिक फ्लू, न्यूमोकोकल और शिंगल्स जैसे टीकों पर विचार किया जा सकता है।
टीका छूट गया तो दोबारा पूरा टीकाकरण जरूरी नहीं
कई लोगों को लगता है कि यदि किसी टीके की निर्धारित खुराक समय पर नहीं लग पाई तो पहले लगाए गए सभी टीकों का असर खत्म हो जाता है और पूरा टीकाकरण दोबारा शुरू करना पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं होता। व्यक्ति के पुराने टीकाकरण रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद डॉक्टर यह तय कर सकते हैं कि केवल छूटी हुई खुराक, कैच अप डोज या बूस्टर की जरूरत है।
इसलिए टीकाकरण का रिकॉर्ड संभालकर रखना महत्वपूर्ण है। किसी खुराक के छूट जाने पर घबराने के बजाय चिकित्सक से सलाह लेकर आगे की खुराक का सही समय तय कराया जाना चाहिए।
टीकाकरण को उम्र के साथ जोड़कर देखने की जरूरत
टीकाकरण को केवल बच्चों के स्वास्थ्य से जोड़कर देखना अब पर्याप्त नहीं है। जीवन के अलग अलग चरणों में शरीर की जरूरतें बदलती हैं और उसी के अनुरूप टीकाकरण की जरूरत भी बदल सकती है।
किशोरों में HPV और बूस्टर टीकों से लेकर गर्भवती महिलाओं में मां और शिशु की सुरक्षा तथा वरिष्ठ नागरिकों में फ्लू, न्यूमोकोकल और शिंगल्स जैसी बीमारियों से बचाव तक टीकाकरण की भूमिका लगातार बनी रहती है।
कुछ मिनट की डॉक्टर से बातचीत बन सकती है सुरक्षा कवच
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का संदेश साफ है कि टीकाकरण को केवल बचपन तक सीमित नहीं समझना चाहिए। हर व्यक्ति को समय समय पर अपने टीकाकरण रिकॉर्ड की समीक्षा करनी चाहिए और डॉक्टर से अपनी उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और जीवनशैली के अनुसार जरूरी टीकों के बारे में जानकारी लेनी चाहिए।
राष्ट्रीय टीकाकरण जागरूकता माह के दौरान विशेषज्ञों की सलाह है कि लोग अपने डॉक्टर से सीधे यह सवाल पूछें कि उनकी उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार उन्हें कौन से टीके लगवाने चाहिए।
टीकाकरण बीमारी होने के बाद इलाज करने के बजाय बीमारी से पहले सुरक्षा देने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सही समय पर लगाया गया टीका गंभीर संक्रमण के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है। इसलिए बचपन में शुरू हुआ टीकाकरण का सफर उम्र बढ़ने के साथ खत्म नहीं होना चाहिए, बल्कि जरूरत के अनुसार आगे भी जारी रहना चाहिए।



