नई दिल्ली। मानसिक स्वास्थ्य भी शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके बावजूद मानसिक परेशानियों को लेकर समाज में आज भी कई तरह के भ्रम और झिझक मौजूद हैं। आत्महत्या जैसे बेहद संवेदनशील विषय पर खुलकर बातचीत करने के बजाय अक्सर लोग चुप्पी साध लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह चुप्पी मानसिक परेशानी से जूझ रहे व्यक्ति के अकेलेपन को और बढ़ा सकती है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लोगों को आत्महत्या से जुड़े आम मिथकों और उनके पीछे की वास्तविकता के बारे में जानकारी दी है। साथ ही लोगों से अपील की गई है कि मानसिक परेशानी से गुजर रहे किसी व्यक्ति की बात को गंभीरता से सुनें और जरूरत पड़ने पर उसे विशेषज्ञ सहायता लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
आत्महत्या की बात करने वाले व्यक्ति को नजरअंदाज न करें
सबसे आम भ्रमों में से एक यह है कि जो व्यक्ति आत्महत्या की बात करता है, वह वास्तव में ऐसा करना नहीं चाहता। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के मुताबिक यह धारणा सही नहीं है। गहरे मानसिक और भावनात्मक दर्द से गुजर रहा व्यक्ति सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी परेशानी अथवा आत्महत्या से जुड़े विचारों का संकेत दे सकता है।
ऐसे संकेतों को मजाक या महज ध्यान आकर्षित करने की कोशिश समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। व्यक्ति की बात को गंभीरता से सुनना और उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश करना जरूरी है।
आत्महत्या के बारे में पूछने से नहीं बढ़ता विचार
एक अन्य आम मिथक यह है कि किसी व्यक्ति से आत्महत्या के बारे में पूछने से उसके मन में आत्महत्या का विचार पैदा हो सकता है। स्वास्थ्य मिशन के अनुसार ऐसा नहीं है।
संवेदनशीलता के साथ और बिना किसी तरह का निर्णय सुनाए सीधे बातचीत करना परेशान व्यक्ति को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर दे सकता है। कई बार संकट में फंसे व्यक्ति को तत्काल समाधान देने से पहले ऐसे इंसान की जरूरत होती है, जो उसकी बात धैर्यपूर्वक सुने और उसे अकेला महसूस न होने दे।
आत्महत्या का विचार रखने वाला व्यक्ति हमेशा दृढ़ नहीं होता
यह मानना भी सही नहीं है कि आत्महत्या के विचारों से जूझ रहा व्यक्ति मरने का पूरी तरह दृढ़ निश्चय कर चुका होता है। कई लोग वास्तव में अपने जीवन को खत्म करने के बजाय उस गहरे भावनात्मक दर्द और परेशानी से राहत चाहते हैं, जिसका वे सामना कर रहे होते हैं।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति के मन में दुविधा भी हो सकती है। इसलिए समय पर सहायता, भावनात्मक सहयोग और उचित हस्तक्षेप महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
व्यवहार में बदलाव को समझना जरूरी
एक और महत्वपूर्ण भ्रम यह है कि आत्महत्या हमेशा बिना किसी चेतावनी के होती है। कई मामलों में व्यक्ति पहले से कुछ संकेत दे सकता है। लगातार निराश रहना, लोगों से दूरी बनाना, अत्यधिक चिड़चिड़ापन, व्यवहार में अचानक बदलाव या मृत्यु के बारे में बार-बार बात करना ऐसे संकेतों में शामिल हो सकते हैं।
इन बदलावों को सामान्य मानकर टालने के बजाय व्यक्ति से बातचीत करना और उसकी स्थिति को समझने का प्रयास करना जरूरी है।
सिर्फ मानसिक बीमारी को जिम्मेदार मानना भी सही नहीं
यह धारणा भी पूरी तरह सही नहीं है कि आत्महत्या करने वाला हर व्यक्ति किसी मानसिक बीमारी से ही जूझ रहा होता है। मानसिक विकार आत्महत्या के जोखिम को बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कारक हो सकते हैं, लेकिन इसके पीछे कई तरह के कारण एक साथ काम कर सकते हैं।
मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, जैविक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों का जटिल मेल भी किसी व्यक्ति को गंभीर मानसिक संकट में पहुंचा सकता है। इसलिए किसी व्यक्ति की परेशानी को केवल एक कारण से जोड़कर देखना उचित नहीं है।
परेशानी को छोटा न समझें, साथ खड़े रहें
मानसिक परेशानी से गुजर रहे व्यक्ति की भावनाओं को छोटा या महत्वहीन नहीं समझना चाहिए। उसकी बात ध्यान से सुनना, उसे समझने की कोशिश करना और बिना किसी निर्णय के उसके साथ खड़ा रहना महत्वपूर्ण है।
यदि किसी व्यक्ति की स्थिति गंभीर नजर आए या उसे मदद की जरूरत महसूस हो तो उसे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। समय पर मिलने वाली सहायता संकट की स्थिति में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए 14416 पर करें संपर्क
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए टोल-फ्री नंबर 14416 पर संपर्क किया जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर खुलकर और संवेदनशीलता के साथ बातचीत करना जरूरी है। किसी परेशान व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय उसकी बात सुनना, उसकी स्थिति को समझना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता तक पहुंचाना समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

