बाबा नीब करौरी पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ की धूम! जानिए कहां से शुरू हुई लक्ष्मण दास की तपस्या

फर्रुखाबाद। बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ इन दिनों दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। फिल्म को दर्शकों की ओर से अच्छी प्रतिक्रिया मिलने के साथ ही बाबा नीब करौरी महाराज से जुड़े धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को लेकर भी लोगों की रुचि बढ़ी है। इसी क्रम में नीब करौरी धाम के मुख्य पुजारी श्री श्री त्यागी जी महाराज, फर्रुखाबाद की जिला पंचायत अध्यक्ष मोनिका यादव, मंदिर के पुजारी और स्थानीय लोगों ने बाबा की तपस्या, भगवान हनुमान के प्रति उनकी भक्ति और नीब करौरी धाम के इतिहास से जुड़ी कई बातें साझा कीं।

नीब करौरी गांव में तपस्या से जुड़ी बाबा की आध्यात्मिक यात्रा

नीब करौरी धाम के मुख्य पुजारी श्री श्री त्यागी जी महाराज के अनुसार, फर्रुखाबाद जनपद के ग्राम नीब करौरी में बाबा लक्ष्मण दास महाराज ने लंबे समय तक तपस्या की थी। उनके अनुसार बाबा वर्ष 1912 से लेकर 1935 के बीच इस स्थान पर रहे और यहीं साधना करते हुए आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की।

मुख्य पुजारी ने बताया कि ग्राम नीब करौरी में साधना और सिद्धि प्राप्त करने के बाद बाबा लक्ष्मण दास महाराज की पहचान नीब करौरी महाराज के रूप में प्रसिद्ध हो गई। इसके बाद बाबा जहां भी गए, वहां बनाए गए आश्रमों को भी नीब करौरी धाम की परंपरा से जोड़ा गया।

आज भी मौजूद है तपस्या की गुफा और हवन कुंड

नीब करौरी धाम में आज भी वह गुफा और हवन कुंड मौजूद होने की बात कही जाती है, जहां बाबा लक्ष्मण दास महाराज ने साधना की थी। मुख्य पुजारी के अनुसार, यही वह स्थान है जहां बाबा ने तपस्या के माध्यम से आध्यात्मिक शक्तियां प्राप्त की थीं।

धाम में उस पीपल के पेड़ के मौजूद होने की भी बात कही जाती है, जिसके नीचे बैठकर बाबा साधना किया करते थे। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, बाबा ने अपने हाथों से गोबर के मिश्रण से भगवान हनुमान का विग्रह भी तैयार किया था। इन स्थानों को आज भी बाबा की साधना और आध्यात्मिक यात्रा की महत्वपूर्ण स्मृतियों के रूप में देखा जाता है।

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भंडारे के बाद छोड़ दिया था नीब करौरी गांव

मुख्य पुजारी श्री श्री त्यागी जी महाराज ने आईएएनएस से बातचीत में बताया कि बाबा ने वर्ष 1912 से 1935 तक यहां तपस्या की और इसी दौरान आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की। उन्होंने बताया कि उस दौर में एक भव्य भंडारे का आयोजन भी किया गया था, जिसे धार्मिक दृष्टि से पुण्य का कार्य माना जाता है।

उनके अनुसार, वर्ष 1935 के बाद बाबा नीब करौरी गांव से आगे की आध्यात्मिक यात्रा पर निकल गए। मुख्य पुजारी ने कहा कि बाबा को उनकी आध्यात्मिक शक्तियां इसी गांव में साधना के दौरान प्राप्त हुई थीं और इसी वजह से नीब करौरी को बाबा की आध्यात्मिक यात्रा का मुख्य स्थल माना जाता है।

देशभर में 108 हनुमान मंदिरों से जुड़ा नाम

मुख्य पुजारी के अनुसार, बाबा नीब करौरी महाराज ने अपने जीवनकाल में देश के अलग-अलग शहरों में 108 हनुमान मंदिरों की स्थापना कराई। इनमें लखनऊ में गोमती नदी के किनारे स्थित प्रसिद्ध हनुमान सेतु मंदिर भी शामिल है।

बाबा नीब करौरी महाराज ने दो प्रमुख आश्रम भी स्थापित किए। इनमें पहला उत्तराखंड के कैंची में स्थित कैंची धाम और दूसरा मथुरा के वृंदावन में स्थित आश्रम बताया जाता है। वृंदावन आश्रम की स्थापना वर्ष 1967 में हुई थी।

11 सितंबर 1973 को वृंदावन में ली महासमाधि

बाबा नीब करौरी महाराज की आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव वृंदावन रहा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन स्थित आश्रम में महासमाधि ली थी। इसके बाद भी उनके अनुयायियों के बीच उनकी शिक्षाओं और भगवान हनुमान के प्रति उनकी भक्ति की परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही।

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कैंची धाम से लेकर फर्रुखाबाद के नीब करौरी गांव और वृंदावन तक बाबा से जुड़े स्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं।

हनुमान भक्ति से जुड़ी है बाबा की पहचान

बाबा नीब करौरी महाराज का मूल नाम पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा बताया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब वह फर्रुखाबाद के नीब करौरी गांव में साधना में लीन थे, तब उन्हें भगवान हनुमान के साक्षात दर्शन हुए। इसके बाद उनकी पहचान नीब करौरी महाराज के नाम से होने लगी और आगे चलकर वह इसी नाम से देश-विदेश में प्रसिद्ध हुए।

उनके जीवन से जुड़ी कथाओं में भगवान हनुमान के प्रति उनकी गहरी आस्था और भक्ति को विशेष स्थान दिया जाता है। यही वजह है कि उनके अनुयायी उन्हें हनुमान भक्ति की परंपरा से जोड़कर देखते हैं।

जिला पंचायत अध्यक्ष बोलीं- फिल्म से लोगों को मिलेगी और जानकारी

फर्रुखाबाद की जिला पंचायत अध्यक्ष मोनिका यादव ने फिल्म ‘हनुमान अंश’ की सराहना की। उन्होंने कहा कि फिल्म बहुत अच्छी है और वह सभी लोगों से इसे देखने की अपील करेंगी।

मोनिका यादव ने कहा कि बाबा जी सर्वव्यापी हैं और कैंची धाम के साथ फर्रुखाबाद में भी उन्होंने समय बिताया था। उन्होंने कहा कि लोगों को बाबा के फर्रुखाबाद से जुड़े इस पक्ष के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए।

उन्होंने दावा किया कि फिल्म हाउसफुल चल रही है और बड़ी संख्या में लोग इसे देखने पहुंच रहे हैं। उनके मुताबिक फिल्म के माध्यम से लोगों को बाबा नीब करौरी के जीवन और उनके फर्रुखाबाद से संबंध के बारे में और अधिक जानकारी मिलेगी। उन्होंने कहा कि देश ही नहीं, विदेशों में भी बड़ी संख्या में लोग बाबा नीब करौरी के बारे में जानते हैं।

स्थानीय लोगों को भी पसंद आ रही फिल्म

एक स्थानीय व्यक्ति ने फिल्म ‘हनुमान अंश’ की सराहना करते हुए कहा कि उन्हें फिल्म बहुत अच्छी लगी। उनके मुताबिक फिल्म में नीब करौरी धाम और बाबा नीब करौरी के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।

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स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि फिल्म में बाबा के जीवन के विभिन्न चरणों को दिखाया गया है। उनके जन्म से लेकर कैंची धाम तक की यात्रा को फिल्म में शामिल किया गया है। उनके अनुसार, फिल्म देखने के बाद लोगों को बाबा नीब करौरी के जीवन के बारे में और जानकारी मिल रही है।

पुजारी बोले- तपस्या की शक्ति से हनुमान जी की स्थापना की

हनुमान मंदिर के पुजारी ने कहा कि बाबा नीब करौरी ने अपनी तपस्या की शक्ति से भगवान हनुमान की स्थापना की थी। उन्होंने धार्मिक मान्यता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान हनुमान ने स्वयं बाबा को साक्षात दर्शन दिए थे।

पुजारी के अनुसार, बाबा ने 1912 से 1935 तक नीब करौरी में साधना की। इसके बाद वह उत्तराखंड, दिल्ली और लखनऊ सहित कई स्थानों की यात्रा पर गए। उन्होंने कहा कि बाबा की पहचान आज देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में इसी नाम से बनी हुई है।

फिल्म ने फिर सामने ला दी नीब करौरी धाम की कहानी

‘हनुमान अंश’ फिल्म के जरिए बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन, उनकी साधना और भगवान हनुमान के प्रति उनकी भक्ति एक बार फिर चर्चा में है। फिल्म की लोकप्रियता के बीच नीब करौरी धाम से जुड़े लोग भी बाबा की तपोभूमि के इतिहास और धार्मिक महत्व को लोगों तक पहुंचा रहे हैं।

फर्रुखाबाद का नीब करौरी गांव बाबा के अनुयायियों के लिए इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार उन्होंने यहां वर्षों तक साधना की थी। गुफा, हवन कुंड, पीपल का पेड़ और मंदिर परिसर से जुड़ी मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं को बाबा की आध्यात्मिक यात्रा की याद दिलाती हैं।

 


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