नई दिल्ली। हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का वास्तुकार, इंजीनियर और शिल्पकार माना जाता है। मान्यता है कि उन्होंने देवताओं के लिए कई भव्य नगरों, महलों और मंदिरों का निर्माण किया था। भगवान विश्वकर्मा की जयंती इस वर्ष 17 सितंबर को मनाई जाएगी। देशभर में इसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं। कारखानों, प्रतिष्ठानों और विभिन्न निर्माण कार्यों से जुड़े संस्थानों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाएगी।
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी पौराणिक कथाओं में देवघर स्थित प्रसिद्ध बाबा वैद्यनाथ धाम की कथा भी बेहद रोचक मानी जाती है। मान्यता है कि देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने एक ही रात में बाबा वैद्यनाथ मंदिर सहित पांच मंदिरों का निर्माण किया था। इसी कथा में एक अधूरे मंदिर और उसके निर्माण से जुड़े रहस्य का भी उल्लेख मिलता है।
देवताओं ने सौंपी थी मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जंगलों से घिरे एक स्थान पर देवताओं ने मंदिर स्थापित करने का निर्णय लिया था। इस महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा को सौंपी गई। भगवान विश्वकर्मा ने मंदिर निर्माण का संकल्प लिया और एक ही रात में पांच मंदिरों के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया।
मान्यता है कि उन्होंने सबसे पहले भगवान भोलेनाथ के मंदिर का निर्माण किया। इसके बाद मां पार्वती के मंदिर का निर्माण किया गया। फिर भगवान गणेश और संध्या मंदिर बनाए गए। इस तरह एक ही रात में चार मंदिरों का निर्माण पूरा हो गया।
अपने लिए बनाने लगे सबसे भव्य मंदिर
पौराणिक कथा के अनुसार, चार मंदिरों का निर्माण पूरा करने के बाद भगवान विश्वकर्मा ने अपने लिए एक बेहद भव्य और विशाल मंदिर बनाने का काम शुरू किया। वह चाहते थे कि उनका मंदिर भी भव्यता और स्थापत्य कला की दृष्टि से अद्वितीय हो।
मान्यता है कि देवताओं को चिंता होने लगी कि यदि भगवान विश्वकर्मा ने अपने लिए मंदिर पूरा कर लिया तो वह भगवान भोलेनाथ के मंदिर से भी बड़ा और भव्य हो सकता है। इसके बाद देवताओं ने मंदिर का निर्माण समय से पहले रोकने की योजना बनाई।
विष्णु ने मुर्गे का रूप लेकर समय से पहले दी बांग
कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने मुर्गे का रूप धारण किया और रात खत्म होने से पहले ही बांग दे दी। मुर्गे की आवाज सुनकर भगवान विश्वकर्मा को लगा कि सुबह हो चुकी है। एक रात में मंदिर निर्माण पूरा करने का उनका संकल्प अधूरा रह गया और उन्होंने निर्माण कार्य रोक दिया।
जिस मंदिर का निर्माण वह अपने लिए कर रहे थे, वह अधूरा ही रह गया। पौराणिक मान्यता के अनुसार आज भी इस अधूरे मंदिर को लक्ष्मी नारायण मंदिर के नाम से जाना जाता है।
नारद मुनि ने भोलेनाथ को दी थी जानकारी
इस कथा से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार, नारद मुनि ने भगवान भोलेनाथ को बताया था कि भगवान विश्वकर्मा अपने लिए एक अत्यंत भव्य मंदिर का निर्माण कर रहे हैं। इसके बाद भोलेनाथ ने उस मंदिर को अपने अंगूठे से दबा दिया था।
इस तरह बाबा वैद्यनाथ धाम से जुड़ी पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा की अद्भुत निर्माण क्षमता के साथ देवताओं के बीच की घटनाओं का भी वर्णन मिलता है। हालांकि ये धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं हैं, जिनका उल्लेख श्रद्धालुओं और धार्मिक परंपराओं में किया जाता है।
12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है बाबा वैद्यनाथ धाम
देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। इसे भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल माना जाता है। यहां वर्षभर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
श्रावण मास के दौरान बाबा वैद्यनाथ धाम में विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिलता है। मंदिर और इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं इसे देश के प्रमुख शिव तीर्थों में विशेष स्थान प्रदान करती हैं।
17 सितंबर को होगी भगवान विश्वकर्मा की पूजा
इस वर्ष भगवान विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर को मनाई जाएगी। दी गई जानकारी के अनुसार इस दिन सुबह 7 बजकर 58 मिनट से दोपहर 12 बजकर 40 मिनट तक पूजा का शुभ समय रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त में भी भगवान विश्वकर्मा की पूजा करना शुभ माना गया है। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 51 मिनट से दोपहर 12 बजकर 40 मिनट तक रहेगा।
भगवान विश्वकर्मा जयंती पर उद्योग, निर्माण, मशीनरी और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग विशेष रूप से पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन औजारों, मशीनों और कार्यस्थल की पूजा कर सुख-समृद्धि और कार्य में सफलता की कामना की जाती है।
देवशिल्पी की कला से जुड़ी है कई निर्माणों की मान्यता
हिंदू धार्मिक परंपराओं में भगवान विश्वकर्मा को सृजन, वास्तुकला और शिल्पकला का प्रतीक माना गया है। उनसे जुड़ी पौराणिक कथाओं में कई भव्य निर्माणों का उल्लेख मिलता है। बाबा वैद्यनाथ धाम की पांच मंदिरों से जुड़ी यह कथा भी इसी धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जिसमें एक ही रात में मंदिर निर्माण और अधूरे रह गए लक्ष्मी नारायण मंदिर का रहस्य श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का विषय बना हुआ है।
विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर एक बार फिर देशभर में देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की पूजा और उनके प्रति आस्था का उत्सव मनाया जाएगा।

