उत्तराखंड। उत्तराखंड की देवभूमि में अनेक प्राचीन धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं। इन्हीं में पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित मां ज्वाल्पा देवी सिद्धपीठ का विशेष स्थान है। पौड़ी-कोटद्वार मार्ग पर नयार नदी के किनारे स्थित यह मंदिर धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और प्राचीन परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
मूर्ति नहीं, प्राकृतिक शिला और अखंड ज्योति की होती है पूजा
मां ज्वाल्पा देवी मंदिर की एक खास विशेषता यह है कि यहां माता रानी की पारंपरिक मूर्ति के बजाय प्राकृतिक शिला और गर्भगृह में प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति के रूप में पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु इस ज्योति को माता के दिव्य स्वरूप का प्रतीक मानकर दर्शन करते हैं।
इस अखंड ज्योति को निरंतर प्रज्ज्वलित रखने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मवालस्यूं, कफोलस्यूं और खातस्यूं सहित आसपास की पट्टियों के गांवों से सरसों के तेल की व्यवस्था की जाती रही है। यह परंपरा मंदिर से स्थानीय समाज के गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।
शची की तपस्या से जुड़ी है पौराणिक मान्यता
मां ज्वाल्पा देवी सिद्धपीठ की उत्पत्ति को लेकर स्कंदपुराण से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, सतयुग में दैत्यराज पुलोम की पुत्री शची, जिन्हें इंद्राणी भी कहा जाता है, ने देवराज इंद्र को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए इसी स्थान पर माता पार्वती की कठोर तपस्या की थी।
कथा के अनुसार, शची की तपस्या से प्रसन्न होकर माता पार्वती ज्वाला स्वरूप में प्रकट हुईं और उनकी मनोकामना पूरी की। इसी मान्यता के आधार पर यह स्थान ज्वाल्पा देवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रद्धालु इस कथा को मंदिर की धार्मिक महत्ता से जोड़कर देखते हैं।
आदिगुरु शंकराचार्य से भी जुड़ी है किंवदंती
मंदिर से जुड़ी किंवदंतियों के अनुसार, नौवीं शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने भी इस स्थान की यात्रा की थी और यहां प्रार्थना व साधना की थी। वर्तमान स्वरूप वाले मंदिर की स्थापना वर्ष 1892 में स्वर्गीय दत्तराम अण्थवाल और उनके पुत्र बूथा राम अण्थवाल द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है।
मुख्य मंदिर के आसपास अन्य धार्मिक स्थल भी स्थित हैं। इनमें श्री हनुमान मंदिर, शिवालय, काल भैरव मंदिर और मां काली का मंदिर प्रमुख हैं। इन मंदिरों के दर्शन के लिए भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
नवरात्र में लगता है भव्य मेला
नवरात्र के अवसर पर मां ज्वाल्पा देवी मंदिर में भव्य मेले का आयोजन होता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर विशेष रूप से मनोकामना पूर्ति और मनवांछित वर की प्राप्ति की कामना करने वाली युवतियों और अन्य श्रद्धालुओं के बीच आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
बुधवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने भी मां ज्वाल्पा देवी मंदिर के महत्व पर जोर देते हुए श्रद्धालुओं से यहां दर्शन करने की अपील की।
प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे नयार नदी के तट पर स्थित मां ज्वाल्पा देवी सिद्धपीठ धार्मिक आस्था, पौराणिक परंपराओं और स्थानीय संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। अखंड ज्योति, प्राचीन मान्यताओं और नवरात्र मेले के कारण इस मंदिर का उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान माना जाता है।
