Home » धर्म-कर्म » नवरात्रि का चौथा दिन आज: मां कुष्मांडा की पूजा से सुख-समृद्धि की कामना, जानें प्रिय भोग, मंत्र और पूजन विधि

नवरात्रि का चौथा दिन आज: मां कुष्मांडा की पूजा से सुख-समृद्धि की कामना, जानें प्रिय भोग, मंत्र और पूजन विधि

Facebook
Twitter
WhatsApp

नई दिल्ली: शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व के चौथे दिन आज मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है। धार्मिक मान्यताओं और सनातन परंपराओं के अनुसार मां कुष्मांडा को सृष्टि की रचयिता माना जाता है। सनातन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जब चारों ओर अंधकार व्याप्त था और संपूर्ण सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब आदिशक्ति ने अपनी मंद मुस्कान मात्र से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण उनका नाम कुष्मांडा पड़ा। आज के दिन देश भर के मंदिरों और घरों में श्रद्धालु मां के इस दिव्य स्वरूप की आराधना कर अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना कर रहे हैं।

नवरात्रि के इस विशेष दिन पर प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने का विधान है। श्रद्धालु अपने घरों के पूजा स्थलों पर दीप प्रज्वलित कर मां दुर्गा के समक्ष व्रत और पूजन का संकल्प लेते हैं। ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां कुष्मांडा को लाल, पीले और हरे रंग के वस्त्र अत्यंत प्रिय हैं। इन सात्विक रंगों के वस्त्र पहनकर पूजा-अर्चना करने से भक्तों के मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

अष्टभुजा धारी और सूर्य लोक की स्वामिनी का स्वरूप

मां कुष्मांडा का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी, ओजस्वी और दिव्य माना जाता है। देवी का वर्ण स्वर्णिम आभा वाला है और उनके मुखमंडल पर हमेशा एक मंद मुस्कान सुशोभित रहती है। उनकी आठ भुजाएं हैं, जिसके कारण उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। उनके इन आठ हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत कलश, चक्र, माला और गदा सुशोभित होने का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। मां का वाहन सिंह है, जिसे शक्ति, साहस और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। उनका यह स्वरूप समस्त मानव जाति को यह प्रेरणा देता है कि जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना भी धैर्य, साहस और अटूट सकारात्मक सोच के साथ किया जाना चाहिए।

ALSO READ THIS :  शारदीय नवरात्रि 2026: किस दिन किस देवी की पूजा? जानें नौ स्वरूपों का महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार मां कुष्मांडा का निवास सूर्य मंडल के भीतर माना जाता है और उनके दिव्य तेज से ही संपूर्ण संसार को ऊर्जा प्राप्त होती है। सूर्य के समान प्रकाशमान और ऊर्जावान देवी अपने भक्तों के जीवन से समस्त प्रकार के अंधकार, नकारात्मकता और निराशा को दूर करती हैं। नवरात्रि के इस चतुर्थ दिवस पर मां की आराधना कर भक्त अपने जीवन में एक नई शुरुआत, सफलता और दीर्घकालिक खुशहाली का वरदान मांगते हैं।

कद्दू और शुद्ध घी का भोग लगाने की परंपरा

मां कुष्मांडा के नाम में कुम्हड़ा यानी कद्दू का विशेष संबंध होने के कारण धार्मिक परंपराओं में उन्हें कद्दू से बने व्यंजन अर्पित करने की प्राचीन मान्यता है। इस दिन भक्त मां को कद्दू का पेठा और अन्य सात्विक पकवानों का भोग लगाते हैं। इसके साथ ही देवी को शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

मान्यता है कि मां कुष्मांडा को शुद्ध घी का भोग लगाने से भक्तों को आरोग्य, सुख और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। देश के कई क्षेत्रों में नवरात्रि के इस पावन दिन मां को मालपुए का भोग लगाने की परंपरा भी पीढ़ियों से चली आ रही है। भक्त अपनी श्रद्धा, भक्ति और सामर्थ्य के अनुसार फल, मिठाई और सात्विक भोजन अर्पित कर देवी को प्रसन्न करते हैं।

पूजन विधि और मंत्र साधना का महत्व

नवरात्रि के चौथे दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके पश्चात घर के मंदिर की पूर्ण रूप से सफाई कर मां दुर्गा और मां कुष्मांडा की प्रतिमा अथवा तस्वीर की स्थापना की जाती है। पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाकर देवी को पुष्प, अक्षत, रोली, धूप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।

ALSO READ THIS :  चंपावत का पुराना बालेश्वर मंदिर: पत्थरों की नक्काशी में छिपी सदियों पुरानी शिव भक्ति की कहानी

मां को लाल, पीले अथवा हरे रंग के पुष्प अर्पित करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। पूजन के उपरांत मां कुष्मांडा के दिव्य मंत्रों का जप किया जाता है और दुर्गा चालीसा तथा देवी स्तोत्र का पाठ संपन्न होता है। इस पूरी पूजा के दौरान परिवार की सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और समस्त बाधाओं के निवारण की प्रार्थना की जाती है।

श्रद्धावान भक्त अपनी आस्था के अनुसार व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरा दिन मां का स्मरण कर उनके मंत्रों का मानसिक जप करते हैं। संध्या काल में पुनः विधि-विधान से मां की आरती और भोग अर्पण के बाद व्रत खोला जाता है। इस दौरान स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना भी अनिवार्य माना गया है।

सकारात्मकता और जीवन में आशा का संदेश

मां कुष्मांडा की पूजा केवल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका यह स्वरूप मानव जीवन में अनंत आशा, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है। उनकी मंद मुस्कान यह सिखाती है कि व्यक्ति को विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपना धैर्य और ईश्वर पर विश्वास नहीं खोना चाहिए। नवरात्रि के इस पावन पर्व पर मां कुष्मांडा की आराधना का यह क्रम समाज में आत्मबल और सात्विक भाव को सुदृढ़ करने का कार्य करता है।

[wonderplugin_slider id=1]

टॉप स्टोरी

ज़रूर पढ़ें