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1 नवंबर को दुर्लभ संयोग: रवि पुष्य योग, भानु सप्तमी और अहोई अष्टमी एक साथ, जानें क्या करना होगा शुभ

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रविवार, 1 नवंबर 2026 को कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि और पुष्य नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। इस दिन रविवार होने के कारण रवि पुष्य योग रहेगा। साथ ही सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि होने से भानु सप्तमी का योग भी बन रहा है। वहीं, शाम को अष्टमी तिथि रहने के कारण अहोई अष्टमी का व्रत भी इसी दिन किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष संयोग में सूर्यदेव और अहोई माता की पूजा करना शुभ माना जाता है।

पंचांग के अनुसार, 1 नवंबर को सप्तमी तिथि दोपहर करीब 2 बजकर 55 मिनट तक रहेगी। इसके बाद अष्टमी तिथि शुरू हो जाएगी। चूंकि शाम के प्रदोषकाल में अष्टमी तिथि रहेगी, इसलिए इस वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा। इस दिन पूजा-पाठ के साथ नदी स्नान और दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है।

रवि पुष्य योग में कौन से काम करना शुभ?

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, पुष्य नक्षत्र को नक्षत्रों का राजा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे धन, समृद्धि, स्थिरता और शुभता का प्रतीक माना गया है। जब रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र पड़ता है तो रवि पुष्य योग बनता है।

इस योग में सोना-चांदी और आभूषण खरीदना, नया व्यापार शुरू करना, वाहन और संपत्ति की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा लक्ष्मी पूजा और सूर्यदेव की उपासना भी विशेष फलदायी मानी जाती है। मान्यता है कि इस योग में शुरू किए गए शुभ कार्यों से सुख-समृद्धि और उन्नति के अवसर बढ़ते हैं।

अहोई अष्टमी पर संतान की लंबी उम्र के लिए रखें व्रत

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कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की अच्छी सेहत, लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना से व्रत रखती हैं। उत्तर भारत में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है।

व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह स्नान करके उपवास का संकल्प लेती हैं। दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को अहोई माता की पूजा की जाती है। पूजा स्थल पर अहोई माता और उनके बच्चों का चित्र बनाया जाता है या पारंपरिक तस्वीर स्थापित की जाती है। इसके बाद रोली, चावल, फूल और दीपक आदि से पूजा की जाती है।

इस दौरान अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनी और सुनाई जाती है। शाम को तारे दिखाई देने पर उन्हें अर्घ्य देकर संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना की जाती है। कुछ क्षेत्रों में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा भी है।

भानु सप्तमी पर सूर्यदेव को अर्घ्य देने का महत्व

1 नवंबर को रविवार होने के साथ सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि रहने से भानु सप्तमी का संयोग बन रहा है। रविवार को सूर्यदेव का दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सूर्य की उपासना करने से आरोग्य, आत्मविश्वास, मान-सम्मान और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

भानु सप्तमी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें लाल फूल, अक्षत और कुमकुम डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। सूर्यदेव के मंत्र ‘ॐ सूर्याय नमः’ का जाप करना भी शुभ माना जाता है। इसके अलावा आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है।

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पुष्य नक्षत्र में दान-पुण्य का विशेष महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रवि पुष्य योग में जरूरतमंदों की सहायता करना और दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है। इस दिन भूखों को भोजन कराना, गौसेवा करना और गरीब बच्चों को शिक्षा सामग्री दान करना पुण्यकारी माना गया है।

अपनी सामर्थ्य के अनुसार पीले फल, अनाज, गुड़, तांबे के बर्तन और वस्त्र का दान भी किया जा सकता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

इस तरह 1 नवंबर को रवि पुष्य योग, भानु सप्तमी और अहोई अष्टमी का विशेष संयोग धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा। इस दिन सूर्यदेव की उपासना, अहोई माता की पूजा और जरूरतमंदों की सहायता करने का विशेष महत्व रहेगा।

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