मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में छह साल पहले ड्यूटी के दौरान एक होमगार्ड की बेरहमी से चाकू घोंपकर की गई हत्या के मामले में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोषी को मृत्युदंड यानी फांसी की सजा से दंडित किया है। इस फैसले के बाद न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास और मजबूत हुआ है, वहीं पीड़ित परिवार ने छह साल के लंबे इंतजार के बाद राहत की सांस ली है।
अपर जिला एवं सत्र न्यायालय और फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या तीन के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी दीपक को दोषी करार दिया। आरोपी दीपक नगर कोतवाली क्षेत्र की डीलर वाली गली का निवासी है और उसके पिता का नाम लाल सिंह है। अदालत ने सभी गवाहों और सबूतों को मद्देनजर रखते हुए दोषी दीपक को मौत की सजा सुनाई। मुजफ्फरनगर के न्यायिक इतिहास में यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले नब्बे दिनों के भीतर मुजफ्फरनगर की विभिन्न अदालतों द्वारा ग्यारह दोषियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, जो अपराध के खिलाफ न्यायपालिका के कड़े रुख को दर्शाता है।
ड्यूटी के दौरान हुआ था जानलेवा हमला
अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में पेश की गई कहानी के अनुसार, यह दर्दनाक घटना चार जून दो हजार बीस की रात को घटित हुई थी। करीब सवा दस बजे नगर कोतवाली के अंतर्गत आने वाली बुढ़ाना मोड़ पुलिस चौकी पर तैनात कांस्टेबल इस्लाम और उनके साथ इक्यावन वर्षीय होमगार्ड रतिराम मोटरसाइकिल से इलाके में गश्त कर रहे थे। होमगार्ड रतिराम लकड़संधा क्षेत्र के रहने वाले थे।
गश्त के दौरान जब दोनों पुलिसकर्मी डीलर वाली गली के पास पहुंचे, तो उन्हें वहां स्थित एक मकान से किसी महिला के जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए दोनों जांबाज पुलिसकर्मी तुरंत मौके पर पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने देखा कि आरोपी दीपक अपनी मां राजबाला के साथ बुरी तरह विवाद कर रहा था और उनके साथ मारपीट पर आमादा था।
बचाव करने गए होमगार्ड के पेट में घोंपा चाकू
मामले को शांत कराने और महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जब कांस्टेबल इस्लाम और होमगार्ड रतिराम ने बीच-बचाव करने का प्रयास किया और आरोपी दीपक को रोकने की कोशिश की, तो आरोपी अचानक उग्र हो गया। उसने कानून के रखवालों के साथ न केवल बेहद अभद्र भाषा का प्रयोग किया और गाली-गलौज की, बल्कि पास में रखा एक धारदार चाकू उठाकर होमगार्ड रतिराम के पेट में घोंप दिया।
चाकू लगने से होमगार्ड रतिराम लहूलुहान होकर वहीं गिर गए और तड़पने लगे। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी दीपक मौके पर फैली अफरा-तफरी का फायदा उठाकर वहां से फरार हो गया। गंभीर रूप से घायल रतिराम को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां से उनकी नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें मेरठ के उच्च अस्पताल में रेफर कर दिया गया। वहां करीब चार महीने तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद आखिरकार चार अक्टूबर दो हजार बीस को इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
जानलेवा हमले का केस हत्या के मुकदमे में बदला
घटना की शुरुआत में कांस्टेबल इस्लाम की लिखित तहरीर के आधार पर आरोपी दीपक के खिलाफ जानलेवा हमला करने और सरकारी कार्य में बाधा डालने की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस आरोपी की तलाश में जुटी रही। इसके बाद जब इलाज के दौरान होमगार्ड रतिराम की मृत्यु हो गई, तो उनके पुत्र अर्जुन की तहरीर पर मामले को हत्या की संगीन धाराओं में तब्दील कर दिया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने प्रभावी पैरवी की और अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत किए। इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में कुल तेरह चश्मदीद और अन्य महत्वपूर्ण गवाह पेश किए गए। इन सभी गवाहों के बयानों और चिकित्सकीय रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय ने दीपक को हत्या का मुख्य दोषी पाया।
न्यायालय ने की बेहद गंभीर और ऐतिहासिक टिप्पणी
इस मामले में अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए माननीय न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील और विचारणीय टिप्पणी भी की, जो आज के समाज में सुरक्षाकर्मियों के महत्व को रेखांकित करती है। न्यायाधीश ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि जब कानून का कोई प्रहरी गिरता है या उस पर हमला होता है, तो केवल एक खाकी वर्दी लहूलुहान नहीं होती, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा का विश्वास भी लहूलुहान हो जाता है।
अदालत ने आगे कहा कि ऐसे कठिन समय में न्यायपालिका का यह परम कर्तव्य और दायित्व बन जाता है कि वह अपने कड़े निर्णयों के माध्यम से समाज के उस टूटे हुए विश्वास को पुनः स्थापित करे। अदालत के इस फैसले और टिप्पणी की हर तरफ चर्चा हो रही है और इसे ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की सुरक्षा के लिहाज से एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है।



