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‘विविधता हमारी एकता की सजावट, आरएसएस पूरी ताकत से आपके साथ’, न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का बड़ा संदेश

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न्यूयॉर्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने अंतर-धार्मिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे धार्मिक नेताओं को समर्थन देने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर पर लगातार और निस्वार्थ प्रयास किए जाएं तो दुनिया में संघर्ष, अविश्वास और दूरी के माहौल को बदला जा सकता है। भागवत ने कहा कि अलग-अलग धर्मों और समुदायों के बीच संवाद और सहयोग को मजबूत करना आज की बड़ी जरूरत है।

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न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम में 30 देशों से आए 180 से अधिक प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संगठन अंतर-धार्मिक सहयोग की दिशा में काम कर रहे लोगों के साथ पूरी ताकत से खड़ा है।

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‘हम एक ही सोच पर हैं, आरएसएस पूरी ताकत से आपके साथ’

मोहन भागवत ने धार्मिक नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि आरएसएस उनके साथ है, क्योंकि संगठन और इन प्रयासों के पीछे एक समान सोच है। उन्होंने कहा कि मानवता को जोड़ने के लिए धार्मिक विविधता को समझना और उसका सम्मान करना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि दुनिया में अलग-अलग धर्म मौजूद हैं, लेकिन इन्हें एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय अलग-अलग रास्तों के रूप में देखना चाहिए, जो अंतिम सत्य की ओर ले जाते हैं।

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‘विविधता हमारी आंतरिक एकता की सजावट है’

आरएसएस प्रमुख ने धार्मिक विविधता को लेकर कहा कि विविधता को खत्म करने के बजाय उसे स्वीकार करना, सम्मान देना और उसकी रक्षा करना चाहिए। उनके मुताबिक जिस तरह व्यक्ति अपनी विशिष्ट पहचान और प्रकृति की रक्षा करता है, उसी तरह उसे दूसरे लोगों की विशिष्टता की भी रक्षा करनी चाहिए।

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भागवत ने कहा कि विविधता प्रकृति का नियम है, जबकि उसके पीछे एकता का सत्य मौजूद है। उन्होंने मानवता को इस मूल विचार को समझने और स्वीकार करने की जरूरत पर जोर दिया।

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भारत के अनुभव को दुनिया तक ले जाने की बात

मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस का मानना है कि भारत के पास पूरी मानवता की एकता का संदेश है और इसे दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाना संगठन की जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि भारत में अनेक धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं मौजूद हैं, फिर भी लोगों को एक-दूसरे के साथ मिलकर रहने की जरूरत है। उनके मुताबिक विविधता के बीच एकता का विचार केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

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मुसलमानों को लेकर पूछे गए सवाल का भी दिया जवाब

कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत से मुसलमानों को लेकर आरएसएस के नजरिए पर भी सवाल किया गया। उन्होंने 2018 में दिल्ली में मुस्लिम प्रतिभागियों के साथ हुई एक बैठक का उल्लेख किया।

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भागवत ने बताया कि उस बैठक में उनसे पूछा गया था कि क्या हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के तहत मुसलमानों को भारत से बाहर कर दिया जाएगा। इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू कहलाने की मूल भावना से दूर हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि हिंदू दृष्टि में सभी रास्ते एक ही सत्य की ओर जाने वाले माने जाते हैं और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा समान है। उनके मुताबिक इंसानों के बीच मूल रूप से कोई भेद नहीं होना चाहिए।

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2018 के बाद मुस्लिम और ईसाई समुदायों से संवाद जारी

मोहन भागवत ने बताया कि 2018 में हुई उस बैठक के बाद भारत में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद का सिलसिला जारी रहा है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समुदायों के बीच बातचीत आपसी समझ और विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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उन्होंने संवाद के साथ सेवा को भी जरूरी बताया और कहा कि दोनों प्रक्रियाएं एक साथ आगे बढ़नी चाहिए।

‘समाधान राजनीति से नहीं, समाज से शुरू होगा’

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि समाज में आपसी विश्वास और सद्भाव का निर्माण केवल राजनीतिक स्तर पर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इसकी शुरुआत समाज के भीतर से होनी चाहिए।

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भागवत ने राजनीति को लेकर कहा कि मौजूदा दौर में राजनीति कई बार स्वार्थ का खेल बन जाती है। ऐसे में समाज को खुद समाधान की दिशा में पहल करनी होगी। उन्होंने भारत के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि बदलाव की शुरुआत समाज से करना अधिक प्रभावी हो सकता है।

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मजबूत जनमत बनने पर राजनीति भी बदलेगी

मोहन भागवत ने कहा कि जब समाज के भीतर किसी मुद्दे को लेकर मजबूत जन-सहमति बनती है, तो राजनीतिक नीतियों पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक नेतृत्व के लिए जनता की राय को लंबे समय तक नजरअंदाज करना मुश्किल होता है।

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उन्होंने कहा कि यदि लोग अपने स्तर पर एकता, सहयोग और निस्वार्थ सेवा का वातावरण तैयार करेंगे तो धीरे-धीरे उसका असर व्यापक समाज और राजनीतिक व्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।

‘अपने ही स्थान पर उस दुनिया का मॉडल बनाएं, जो हम चाहते हैं’

भागवत ने धार्मिक नेताओं और प्रतिभागियों से आह्वान किया कि जिस दुनिया की कल्पना वे करना चाहते हैं, उसका छोटा मॉडल अपने-अपने समाज और क्षेत्र में बनाना शुरू करें।

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उन्होंने कहा कि निस्वार्थ सेवा और एकता के वातावरण वाले क्षेत्रों का निर्माण किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक बदलाव केवल भाषणों और विचारों से नहीं आएगा, बल्कि लोगों को अपने स्तर पर उदाहरण प्रस्तुत करने होंगे।

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अंतर-धार्मिक संवाद को स्थानीय स्तर तक ले जाने की अपील

आरएसएस प्रमुख ने अंतर-धार्मिक संवाद को केवल राष्ट्रीय या बड़े मंचों तक सीमित रखने के बजाय इसे प्रांत, जिले और स्थानीय ब्लॉक स्तर तक ले जाने की अपील की।

उन्होंने कहा कि जब विभिन्न समुदायों के लोग स्थानीय स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ेंगे और साथ मिलकर काम करेंगे, तो आपसी अविश्वास को कम करना आसान होगा। सेवा के माध्यम से समुदायों के बीच सहयोग की वास्तविक मिसालें भी सामने आ सकती हैं।

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‘मिलकर काम करेंगे तो दुनिया की स्थिति बदल सकती है’

मोहन भागवत ने कहा कि अगर अलग-अलग समुदाय मिलकर काम करना शुरू करें तो दुनिया के मौजूदा माहौल में बदलाव लाया जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह आसान या तत्काल होने वाला काम नहीं है।

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उन्होंने लोगों को धैर्य रखने की सलाह देते हुए कहा कि समाज की सोच और धारणाओं में बदलाव आने में समय लगता है। लगातार संवाद, सेवा और जमीनी स्तर पर सहयोग के माध्यम से धीरे-धीरे विश्वास का वातावरण तैयार किया जा सकता है।

भागवत का संदेश यही रहा कि धार्मिक विविधता को संघर्ष का कारण बनाने के बजाय उसे मानवता की व्यापक एकता की ताकत के रूप में देखा जाए और समाज के स्तर से ही इस दिशा में ठोस प्रयास शुरू किए जाएं।

 


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