नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि किसी मानवाधिकार संस्था की असली पहचान उसके निपटाए गए मामलों की संख्या से ही नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह उन लोगों की आवाज कितनी प्रभावी ढंग से सुनती है, जो अपनी बात रखने में सबसे कम सक्षम हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा का उद्देश्य केवल उल्लंघनों की पहचान करना नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करना, पीड़ितों को सार्थक राहत देना और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए व्यवस्था में सुधार करना भी होना चाहिए।
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के 33वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि आयोग एक नए विचार के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन अब न्याय की तलाश करने वाले लोगों के लिए एक भरोसेमंद संस्था बन चुका है। उन्होंने कहा कि संविधान में गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और न्याय की जो गारंटी दी गई है, उसे लोगों के रोजमर्रा के जीवन में वास्तविकता के रूप में दिखाई देना चाहिए।
24 लाख से अधिक मामले दर्ज, 23 लाख से ज्यादा का निपटारा
NHRC के पिछले 33 वर्षों के कामकाज का उल्लेख करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि आयोग ने अब तक 24 लाख से अधिक मामले दर्ज किए हैं और 23 लाख से ज्यादा मामलों का निपटारा किया है। उनके अनुसार, मामलों के निपटारे की दर 98 प्रतिशत से अधिक रही है।
उन्होंने कहा कि ये आंकड़े केवल संस्था की कार्यक्षमता नहीं दर्शाते, बल्कि उन मामलों की भी जानकारी देते हैं जिनमें गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को सामने लाया गया। उनके मुताबिक, आयोग की भूमिका उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो दूरदराज के जिलों में रहते हैं और जिनके लिए अदालतों तक पहुंचना कठिन हो सकता है।
CJI ने कहा कि यदि संविधान एक वादा है, तो मानवाधिकार आयोग उस वादे की रक्षा करने वाली संस्थाओं में शामिल है। आयोग उन लोगों की बात सुनता है, जिनकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है। साथ ही, वह कुछ परिस्थितियों में किसी औपचारिक शिकायत की प्रतीक्षा किए बिना भी कार्रवाई कर सकता है।
कमजोरों के लिए बेअसर अधिकारों का कोई वास्तविक अर्थ नहीं
मुख्य न्यायाधीश ने समाज के कमजोर और हाशिए पर मौजूद वर्गों के अधिकारों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि जो अधिकार ताकतवर लोगों के लिए उपयोगी हों, लेकिन कमजोर लोगों के लिए बेअसर साबित हों, उन्हें वास्तविक अधिकार नहीं माना जा सकता। उनके शब्दों में, ऐसी स्थिति में अधिकार केवल बेहतर ढंग से प्रस्तुत की गई सुविधा बनकर रह जाते हैं।
उन्होंने ऐसे विचाराधीन कैदियों का जिक्र किया, जो कभी अपने वकीलों से नहीं मिले; दस्तावेजों के अभाव में रहने वाले प्रवासी मजदूर; परिवारों द्वारा छोड़ दिए गए बुजुर्ग; कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे दिव्यांगजन और ऐसी महिलाएं, जिनकी समस्याएं उन्हें सुरक्षा देने वाली व्यवस्थाओं की नजर में नहीं आ पातीं।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि मानवाधिकार संस्थाओं को उन लोगों तक पहुंचने की जरूरत है, जिन्हें अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने में सबसे अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि संस्थाओं के काम का आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उनकी पहुंच समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक कितनी है।
हिरासत में यातना और बंधुआ मजदूरी जैसे मामलों का उल्लेख
मुख्य न्यायाधीश ने हिरासत में यातना और मौत, बंधुआ मजदूरी, सिलिकोसिस जैसी औद्योगिक बीमारियों और हाशिए पर मौजूद समुदायों के अधिकारों से जुड़े मामलों में NHRC के हस्तक्षेप का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों में संस्थागत कार्रवाई मानवाधिकार उल्लंघनों को सामने लाने के साथ-साथ व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए केवल शिकायतों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। संबंधित संस्थाओं को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रभावित लोगों को प्रभावी राहत मिले और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका भी अहम
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में स्थानीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए CJI ने कहा कि अधिकारों से जुड़े वास्तविक अनुभव अक्सर राजधानी में नहीं, बल्कि दूरदराज के गांवों, स्थानीय इलाकों और यहां तक कि घरों के भीतर सामने आते हैं।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय आयोग बड़े स्तर पर मानक तय करने और व्यापक समस्याओं की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वहीं, राज्य मानवाधिकार आयोग स्थानीय भाषाओं में शिकायतें सुनने, प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने और उल्लंघन की परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझने की स्थिति में होते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि स्थानीय समुदायों के करीब होने के कारण राज्य आयोगों के लिए उन समस्याओं की पहचान करना आसान हो सकता है, जिन पर अक्सर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
अदालतों और मानवाधिकार आयोगों की जिम्मेदारियां अलग-अलग
CJI सूर्यकांत ने मानवाधिकारों की सुरक्षा में न्यायपालिका और मानवाधिकार आयोगों की एक-दूसरे की पूरक भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर अदालतों को आवश्यक हस्तक्षेप करना चाहिए, जबकि मानवाधिकार आयोगों को शिकायतों की जांच, व्यवस्था की कमियों की पहचान और उपेक्षित मुद्दों पर संस्थागत ध्यान सुनिश्चित करने का काम करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इन संस्थाओं के बीच प्रभावी समन्वय से मानवाधिकारों की सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है। इसका उद्देश्य केवल किसी एक मामले का समाधान करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों में सुधार करना भी होना चाहिए, जिनके कारण अधिकारों का उल्लंघन होता है।
पानी के अधिकार को मानव गरिमा से जोड़ा
NHRC ने अपना 33वां स्थापना दिवस ‘पानी जीवन का अमृत: पानी के अधिकार के जरिए मानवीय गरिमा को बढ़ावा देना’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के साथ मनाया। सम्मेलन में जल निकायों के संरक्षण और पुनर्बहाली तथा सभी लोगों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पेयजल स्रोतों की सुरक्षा पर चर्चा की गई।
इस विषय को स्थापना दिवस समारोह से जोड़ने के लिए आयोग की सराहना करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि मानवाधिकार केवल सैद्धांतिक विचार नहीं हैं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन से गहराई से जुड़े हैं।
उन्होंने स्वच्छ पानी की उपलब्धता का उदाहरण देते हुए कहा कि मानवाधिकार उतने ही ठोस हैं, जितना किसी बच्चे के हाथ में साफ पानी का गिलास, और उतने ही जरूरी हैं, जितनी उस बच्चे की प्यास।
कई वरिष्ठ अधिकारी रहे मौजूद
NHRC के स्थापना दिवस समारोह में आयोग के अध्यक्ष जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन, सदस्य जस्टिस (डॉ.) विद्युत रंजन सारंगी, विजया भारती सयानी और प्रियंक कानूनगो, महासचिव पीयूष गोयल सहित वरिष्ठ अधिकारी और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
समारोह में दिए गए संदेश का केंद्र यह रहा कि मानवाधिकारों की प्रभावी सुरक्षा के लिए संस्थाओं को केवल आंकड़ों और प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें उन लोगों तक पहुंचना होगा, जिनकी आवाज कमजोर है और जिनके लिए न्याय तक पहुंचना सबसे कठिन है।

