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कुमाऊं की पहाड़ी पर विराजती हैं मां दूनागिरी, 500 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं श्रद्धालु; जानें शक्तिपीठ की पौराणिक कथा

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अल्मोड़ा। उत्तराखंड की देवभूमि में अनेक ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनसे लोगों की आस्था के साथ-साथ पौराणिक कथाएं भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। इन्हीं प्रमुख धार्मिक स्थलों में अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट क्षेत्र की ऊंची पहाड़ी पर स्थित मां दूनागिरी मंदिर भी शामिल है। प्राकृतिक सुंदरता से घिरे इस मंदिर को श्रद्धालु आस्था और शक्ति का प्रमुख केंद्र मानते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मां के दर्शन और पूजा करने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी होती है।

मां दूनागिरी मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। पहाड़ी पर चढ़ते हुए चारों ओर दिखाई देने वाला प्राकृतिक नजारा यात्रा को और भी खास बना देता है। धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति का यह संगम इस मंदिर को उत्तराखंड के प्रमुख तीर्थ स्थलों में अलग पहचान देता है।

वैष्णवी रूप में विराजमान हैं मां दूनागिरी

मां दूनागिरी मंदिर में मां दुर्गा के वैष्णवी स्वरूप की पिंडी रूप में पूजा की जाती है। इसे कुमाऊं क्षेत्र के प्रमुख वैष्णवी शक्तिपीठों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मंदिर को 51 शक्तिपीठों में से एक माने जाने की धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है।

दूर-दूर से श्रद्धालु मां के दर्शन करने के लिए यहां पहुंचते हैं। विशेष पर्वों और नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तों की संख्या और बढ़ जाती है। मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ और भंडारे आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।

रामायण काल से जुड़ी है दूनागिरी की पौराणिक कथा

मां दूनागिरी मंदिर की पौराणिक मान्यताओं का संबंध रामायण काल से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, जब हनुमान जी लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी बूटी लाने के लिए द्रोणागिरी पर्वत लेकर जा रहे थे, उसी दौरान पर्वत का एक हिस्सा इस स्थान पर गिर गया था। इसी मान्यता के कारण इस क्षेत्र का संबंध द्रोणागिरी पर्वत और रामायण की कथा से जोड़ा जाता है।

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हालांकि यह धार्मिक आस्था और पौराणिक परंपरा का हिस्सा है, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच इस कथा को सदियों से श्रद्धा के साथ सुनाया और माना जाता रहा है।

महाभारत काल से भी जुड़ा बताया जाता है मंदिर

मां दूनागिरी धाम के संबंध में एक अन्य मान्यता महाभारत काल से भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य ने इस क्षेत्र में तपस्या की थी। इसी वजह से द्रोणागिरी और आसपास का क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।

इन पौराणिक कथाओं ने दूनागिरी धाम को केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है।

500 सीढ़ियों की चढ़ाई के बाद होते हैं मां के दर्शन

मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 500 सीढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है। भक्ति और आस्था के साथ भक्त इन सीढ़ियों को पार करते हुए मां के दरबार तक पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद श्रद्धालु मां दूनागिरी देवी की पिंडी स्वरूप में पूजा-अर्चना करते हैं।

मान्यता है कि मां के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती। इसी विश्वास के कारण उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

इस मंदिर में नहीं फोड़ा जाता नारियल

मां दूनागिरी मंदिर की एक खास परंपरा इसे अन्य देवी मंदिरों से अलग करती है। आमतौर पर कई देवी मंदिरों में पूजा के दौरान नारियल फोड़ने की परंपरा देखने को मिलती है, लेकिन मां दूनागिरी मंदिर में नारियल नहीं फोड़ा जाता।

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यहां श्रद्धालु पूजा के दौरान सूखा नारियल चढ़ाते हैं, लेकिन उसे तोड़ा नहीं जाता। पूजा के बाद चढ़ाया गया साबुत नारियल श्रद्धालुओं को वापस दे दिया जाता है। मंदिर की यह परंपरा स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और श्रद्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

मंदिर में चलता रहता है भंडारा

मां दूनागिरी मंदिर परिसर में निरंतर भंडारे का आयोजन किए जाने की परंपरा भी बताई जाती है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद और भोजन की व्यवस्था की जाती है। धार्मिक आयोजनों और नवरात्र जैसे विशेष अवसरों पर मंदिर में विशेष पूजा-पाठ के साथ श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

मंदिर की धार्मिक गतिविधियों के साथ आसपास की प्राकृतिक सुंदरता भी यहां आने वाले लोगों को आकर्षित करती है। पहाड़ों के बीच स्थित होने के कारण दूनागिरी धाम आध्यात्मिक शांति के साथ प्रकृति का मनोहारी अनुभव भी कराता है।

मुख्यमंत्री धामी ने भी की मंदिर दर्शन की अपील

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को मां दूनागिरी मंदिर की धार्मिक और प्राकृतिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए लोगों से इस पवित्र धाम के दर्शन करने की अपील की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा करते हुए इसे आस्था, अध्यात्म और प्राकृतिक सुंदरता का संगम बताया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि मां आदिशक्ति भगवती को समर्पित यह पवित्र धाम अनगिनत भक्तों की श्रद्धा का केंद्र है। उन्होंने नवरात्र के दौरान यहां होने वाले विशेष पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए लोगों से अल्मोड़ा आने पर मां दूनागिरी के दर्शन करने का आग्रह किया।

देवभूमि के धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र

मां दूनागिरी मंदिर धार्मिक आस्था के साथ उत्तराखंड के पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। द्वाराहाट क्षेत्र की पहाड़ियों में स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक वातावरण के साथ हिमालयी प्रकृति के करीब आने का अवसर देता है।

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पौराणिक मान्यताओं, देवी के वैष्णवी स्वरूप, विशेष पूजा परंपराओं और प्राकृतिक वातावरण के कारण मां दूनागिरी धाम उत्तराखंड आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां की मान्यताएं पीढ़ियों से लोगों की आस्था का हिस्सा बनी हुई हैं और नवरात्र सहित अन्य धार्मिक अवसरों पर मंदिर में विशेष रौनक देखने को मिलती है।

 

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