देहरादून। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित सिद्धपीठ मां नंदा देवी की 12 वर्ष बाद आयोजित होने वाली बड़ी जात यात्रा शनिवार को कुरुड़ स्थित नंदा देवी धाम से कैलास के लिए रवाना हो गई। हिमालयी संस्कृति, लोक परंपरा और धार्मिक आस्था से जुड़ी इस ऐतिहासिक यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है। मां नंदा देवी की डोली के कैलास की ओर प्रस्थान के साथ ही चमोली में धार्मिक माहौल और अधिक भक्तिमय हो गया है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को सोशल मीडिया के माध्यम से श्रद्धालुओं और लोगों से चमोली पहुंचने पर कुरुड़ स्थित मां नंदा देवी मंदिर के दर्शन करने की अपील की। उन्होंने इस यात्रा को उत्तराखंड की समृद्ध लोकपरंपरा और गहरी आस्था का प्रतीक बताया।
सीएम धामी ने बताया भक्ति और हिमालयी संस्कृति का दिव्य संगम
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि कुरुड़, चमोली स्थित सिद्धपीठ मां नंदा देवी मंदिर भक्ति, आस्था और हिमालयी संस्कृति का दिव्य संगम है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की समृद्ध परंपरा से जुड़ा यह पावन स्थल अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए विशेष पहचान रखता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि कुरुड़ से जुड़ी नंदा देवी की लोकजात और राजजात यात्रा उत्तराखंड की जीवंत लोकपरंपराओं और गहरी आस्था का अद्भुत प्रतीक है। उन्होंने चमोली आने वाले लोगों से इस पावन मंदिर के दर्शन जरूर करने की अपील की।
मां नंदा का मायका माना जाता है कुरुड़ धाम
कुरुड़ में स्थित नंदा देवी धाम को मां नंदा देवी का मूल मायका माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां नंदा देवी को भगवान शिव की पत्नी माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। मंदिर में मां नंदा देवी चतुर्भुज स्वयंभू शिला मूर्ति के रूप में विराजमान हैं।
कुरुड़ धाम से जुड़ी मां नंदा देवी की डोली दो प्रमुख रूपों में मानी जाती है। इनमें कुरुड़ बधाण और कुरुड़ दशोली की परंपरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। दोनों परंपराओं का उत्तराखंड की लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत में विशेष स्थान है।
296 किलोमीटर का पैदल सफर, 20 सितंबर को पहुंचेगी यात्रा
मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा शनिवार को शुरू हुई। यात्रा के दौरान डोली और श्रद्धालु करीब 296 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करेंगे। इस लंबे धार्मिक सफर में पांच निर्जन और 21 आबादी वाले पड़ाव निर्धारित किए गए हैं।
यात्रा 20 सितंबर को कैलास स्थित होमकुंड पहुंचेगी। वहां धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना और अन्य अनुष्ठान संपन्न किए जाएंगे। इसके बाद मां नंदा देवी की डोली वापसी यात्रा पर निकलेगी।
लगभग एक महीने तक चलने वाली इस धार्मिक यात्रा का समापन 30 सितंबर को होने की जानकारी दी गई है।
मायके पहुंचती हैं विवाहित बेटियां, भावनाओं से जुड़ी है यात्रा
मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़ी हुई है। इस यात्रा में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में विवाहित बेटियां अपने मायके पहुंचती हैं।
उत्तराखंड की लोक परंपरा में मां नंदा को बेटी के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि नंदा देवी की यात्रा को बेटी के मायके आने और फिर अपने ससुराल कैलास लौटने की भावनात्मक परंपरा से भी जोड़ा जाता है।
इस दौरान दूर-दराज क्षेत्रों से श्रद्धालु यात्रा में शामिल होते हैं और मां नंदा देवी की डोली के साथ पैदल सफर करते हैं।
हर साल निकलती है लोकजात यात्रा
कुरुड़ बधाण मां नंदा देवी की डोली हर वर्ष लोकजात यात्रा के दौरान बधाण क्षेत्र में पहुंचती है। यात्रा के दौरान वेदनी कुंड में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद डोली अपने ननिहाल देवराड़ा मंदिर की ओर लौटती है।
लोकजात यात्रा में हर साल हजारों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। यह यात्रा भी उत्तराखंड की प्राचीन धार्मिक और लोक सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
छह महीने देवराड़ा में रहता है मां का डोला
परंपरा के अनुसार मां नंदा देवी की डोली छह महीने तक देवराड़ा मंदिर में निवास करती है। इसके बाद मकर संक्रांति के अवसर पर डोली वापस कुरुड़ धाम पहुंचती है, जिसे मां का मायका माना जाता है।
कुरुड़ पहुंचने के बाद मां नंदा देवी की डोली श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाती है। इस परंपरा के माध्यम से मां नंदा के मायके और ससुराल के बीच धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंध को दर्शाया जाता है।
हिमालयी लोक संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है नंदा देवी राजजात
मां नंदा देवी की लोकजात और राजजात यात्राएं उत्तराखंड की विशिष्ट धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। कठिन पहाड़ी रास्तों, लंबे पैदल सफर और दुर्गम पड़ावों के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह इस यात्रा के दौरान देखते ही बनता है।
बड़ी जात यात्रा के दौरान स्थानीय ग्रामीणों के साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भी मां नंदा की डोली के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। यात्रा के पड़ावों पर धार्मिक अनुष्ठान, पूजा और लोक परंपराओं से जुड़े आयोजन होते हैं।
कैलास की ओर बढ़ी डोली, 30 सितंबर को होगा समापन
12 वर्ष के अंतराल के बाद आयोजित हो रही मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। शनिवार को कुरुड़ धाम से डोली के रवाना होने के साथ ही यात्रा का औपचारिक शुभारंभ हो गया।
अब करीब 296 किलोमीटर की यात्रा तय करते हुए डोली 20 सितंबर को कैलास और होमकुंड पहुंचेगी। इसके बाद वापसी का सफर शुरू होगा और 30 सितंबर को यात्रा के समापन के साथ यह धार्मिक आयोजन संपन्न होगा।
मां नंदा देवी की यह यात्रा एक बार फिर उत्तराखंड की धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और हिमालयी परंपराओं को एक साथ जोड़ने का माध्यम बन रही है।

