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Exclusive: मुजफ्फरनगर में पेपर मिलों की चिमनियों पर अब IIT रुड़की का पहरा, धुएं के खेल पर कसेगा शिकंजा

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RDF जलाने वाली 28 पेपर मिलें रडार पर, 8 के साथ MOU साइन; प्रदूषण फैलाने वालों पर अब टेक्नोलॉजी से वार

मुजफ़्फ़रनगर। सालों से प्रदूषण को लेकर सवालों के घेरे में रही ज़िले की पेपर मिलों की चिमनियों पर अब IIT रुड़की का पहरा बैठने जा रहा है। दावा है कि इससे हवा में घुल रहे ज़हर पर लगाम लगेगी, लेकिन सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या यह कदम वास्तव में असरदार साबित होगा या फिर सिर्फ कागज़ी निगरानी बनकर रह जाएगा।

मुजफ़्फ़रनगर की 28 पेपर मिल शामिल

दरअसल, जनपद की वे 28 पेपर मिलें जो RDF (कचरे से बने ईंधन) का इस्तेमाल कर रही हैं, अब IIT रुड़की की निगरानी में रहेंगी। इन मिलों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं और प्रदूषण के स्तर पर IIT की पैनी नजर होगी। खास बात यह है कि अभी तक 8 पेपर मिलों के साथ एमओयू साइन हो चुका है, जबकि बाकी 20 मिलों को भी जल्द इस दायरे में लाने की तैयारी है।

इन 8 के MoU साइन



इन मिलों में बिंदलास डुप्लेक्स, गर्ग डुप्लेक्स, हनुमंत डुप्लेक्स, एयर स्टो पेपर मिल, सिल्वरटोन (दो यूनिट), केपी डुप्लेक्स और शक्ति पेपर मिल शामिल हैं। वहीं, इस पूरी प्रक्रिया को केवल मुजफ़्फ़रनगर तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि मेरठ की करीब 10 पेपर मिलों को भी इसी निगरानी व्यवस्था में शामिल करने की योजना है।

लगातार उठ रही थी आवाज़



पिछले एक साल से मुजफ़्फ़रनगर में पेपर मिलों की चिमनियों से निकलने वाले काले धुएं को लेकर लगातार आवाज उठ रही थी। स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन बार-बार आरोप लगाते रहे हैं कि मिलें नियमों को ताक पर रखकर प्रदूषण फैला रही हैं, जिससे सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। ऐसे में IIT रुड़की की एंट्री को एक बड़े एक्शन के तौर पर देखा जा रहा है।

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रश्म अदायगी या प्रभावी?



हालांकि, जानकारों का मानना है कि केवल निगरानी से हालात नहीं बदलेंगे, जब तक कि रिपोर्ट के आधार पर सख्त कार्रवाई न हो। अक्सर देखा गया है कि निरीक्षण और रिपोर्ट के बाद भी मिल संचालकों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, जिससे ऐसे कदम सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।

क्या कहते हैं जिम्मेदार?



इस पूरे मामले पर स्थानीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अधिकारी गीतेश चंद्रा का कहना है कि सभी 28 पेपर मिलों को IIT रुड़की के साथ जोड़ा जाना है। IIT इन मिलों की चिमनियों की निगरानी करेगा और प्रदूषण कम करने के लिए समय-समय पर जरूरी सुझाव भी देगा।

“एडजस्टमेंट मॉडल” तो नहीं?



अब बड़ा सवाल यही है कि क्या IIT की यह निगरानी वाकई प्रदूषण पर लगाम लगाएगी या फिर मिलों और सिस्टम के बीच यह एक नया “एडजस्टमेंट मॉडल” बनकर रह जाएगा। फिलहाल लोगों की नजरें इस नई व्यवस्था पर टिक गई हैं, क्योंकि दांव पर सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, बल्कि आम जनता की सेहत भी लगी है।

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