मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद में थाना छपार पुलिस और एसओजी की संयुक्त टीम को जालसाजी और धोखाधड़ी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान में एक बहुत बड़ी कामयाबी हासिल हुई है। पुलिस और स्वाट टीम ने संयुक्त रूप से कार्रवाई करते हुए फर्जी डिग्री और कूट रचित (नकली) दस्तावेज तैयार करने वाले एक बड़े अंतरराज्यीय सिंडिकेट का पर्दाफाश किया है। इस दौरान पुलिस ने पंद्रह हजार रुपये के इनामी मुख्य मास्टरमाइंड सहित तीन शातिर आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पकड़े गए जालसाजों के पास से पुलिस ने भारी मात्रा में फर्जी दस्तावेज, लेटरहेड, अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट, मोबाइल फोन और एक कार बरामद की है। पुलिस का दावा है कि इस गिरोह का नेटवर्क उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब और उत्तराखंड तक फैला हुआ था।
पुलिस लाइन में एसएसपी ने किया सनसनीखेज खुलासा
पुलिस लाइन स्थित मनोरंजन कक्ष में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) संजय कुमार वर्मा, एसपी सिटी अमृत जैन और सीओ सदर विनय कुमार ने इस पूरे मामले की विस्तृत जानकारी दी। अधिकारियों ने बताया कि थाना छपार में दर्ज एक धोखाधड़ी के मुकदमे में काफी समय से फरार चल रहे पंद्रह हजार रुपये के इनामी अपराधी इमलाख उर्फ इमलाक पुत्र इलियास को उसके दो अन्य साथियों डॉ. वी.के. गौतम और डॉ. मंसूर उलहक के साथ बरला-बसेड़ा मार्ग से घेराबंदी करके गिरफ्तार किया गया है। इन तीनों के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और सरकारी दस्तावेजों की कूटरचना करने जैसी गंभीर और संगीन धाराओं के तहत वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।
‘बाबा इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी’ के नाम पर चल रहा था गोरखधंधा
पुलिस की कड़ी पूछताछ में मुख्य सरगना इमलाख ने स्वीकार किया कि वह खुद को ‘बाबा इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी’ का चेयरमैन और डायरेक्टर बताकर लोगों को झांसे में लेता था। वह मोटी रकम के बदले बी-फार्मा, डी-फार्मा और बीएएमएस (आयुर्वेद) जैसी प्रतिष्ठित मेडिकल डिग्रियां फर्जी तरीके से तैयार कर बेचता था। गिरोह एक फर्जी डिग्री के बदले छह से सात लाख रुपये तक की भारी-भरकम राशि वसूल करता था। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, मुख्य आरोपी इमलाख इससे पहले भी उत्तराखंड एसटीएफ द्वारा इसी तरह के एक बड़े फर्जीवाड़े के मामले में गिरफ्तार होकर जेल की हवा खा चुका है, लेकिन जेल से छूटने के बाद उसने दोबारा अपना यह अवैध धंधा शुरू कर दिया।
बिना डिग्री के हरिद्वार में चल रहा था पूरा अस्पताल
गिरफ्तार किए गए दूसरे आरोपी डॉ. वी.के. गौतम ने पुलिस के सामने कबूल किया कि वह उत्तराखंड के हरिद्वार (रुड़की रोड) में ‘हिमालयन मेडिकेयर सेंटर’ नाम से एक निजी अस्पताल का संचालन कर रहा था, जबकि हकीकत में उसके पास चिकित्सा पद्धति से जुड़ी कोई भी वैध डिग्री मौजूद नहीं थी। उसने अपने अस्पताल को कानूनी कार्रवाई से बचाने और डॉक्टर बनने के लिए मुख्य आरोपी इमलाख को छह लाख रुपये देकर बीएएमएस की जाली डिग्री बनवाई थी। इसी प्रकार खतौली के शिवपुरी निवासी तीसरे आरोपी डॉ. मंसूर उलहक ने भी फर्जी दस्तावेज और डिग्री हासिल करने के लिए गिरोह को मोटी रकम देने की बात स्वीकार की है।
छब्बीस फर्जी डिग्री धारक भी आएंगे पुलिस की जद में
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजय कुमार वर्मा ने बताया कि गिरोह के पास से मिले दस्तावेजों और तकनीकी जांच के आधार पर अब तक कुल छत्तीस ऐसे लोगों की पुष्टि हो चुकी है, जिन्होंने इस सिंडिकेट से पैसे देकर फर्जी डिग्रियां खरीदी हैं। पुलिस इन सभी फर्जी लाभार्थियों की पहचान करने में जुट गई है और जल्द ही इन सभी के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस इस पूरे गिरोह के बैंक खातों और वित्तीय लेनदेन की भी गहराई से पड़ताल कर रही है ताकि इसके पूरे नेटवर्क को नेस्तनाबूद किया जा सके।
पुलिस टीम को मिला पच्चीस हजार का नकद पुरस्कार
इस गिरोह को दबोचने में छपार थाना प्रभारी मोहित सहरावत, एसओजी प्रभारी मोहित चौधरी, उपनिरीक्षक तूफान सिंह सहित सर्विलांस सेल के हेड कांस्टेबल विकास चौधरी और नितिन कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई। पुलिस टीम की इस शानदार और बड़ी सफलता पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजय कुमार वर्मा ने पूरी संयुक्त टीम की पीठ थपथपाई है और उनके उत्साहवर्धन के लिए पच्चीस हजार रुपये के नकद पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की है। सभी आरोपियों को न्यायालय के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया गया है।



