नई दिल्ली। शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा का पर्व मां दुर्गा की आराधना, आस्था और भक्ति का प्रतीक है। इन दिनों देशभर में देवी मंदिरों से लेकर पूजा पंडालों तक विशेष तैयारियां की जाती हैं। खासकर पश्चिम बंगाल के कोलकाता में दुर्गा पूजा का उत्सव अपनी भव्य प्रतिमाओं, कलात्मक पंडालों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा तैयार करने के पीछे महीनों की मेहनत, मिट्टी के चयन से लेकर बारीक रंगकारी तक की लंबी प्रक्रिया होती है?
मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में मूर्तिकार पारंपरिक तकनीकों, प्राकृतिक सामग्रियों और पीढ़ियों से चली आ रही कला का इस्तेमाल करते हैं। बांस और पुआल से तैयार ढांचे पर मिट्टी की परतें चढ़ाई जाती हैं। इसके बाद प्रतिमा को आकार दिया जाता है, सुखाया जाता है, रंगों से सजाया जाता है और अंत में आंखें बनाने की विशेष रस्म निभाई जाती है, जिसे चक्षुदान कहा जाता है। समय के साथ इस कला में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए भी बदलाव किए जा रहे हैं।
कुम्हारटोली: जहां महीनों पहले शुरू हो जाती है तैयारी
कोलकाता के उत्तर में स्थित कुम्हारटोली दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध पारंपरिक कारीगर बस्ती है। यहां मूर्तिकार दुर्गा पूजा से काफी पहले प्रतिमाएं बनाने का काम शुरू कर देते हैं। यह स्थान कला, धार्मिक परंपरा और कारीगरों की आजीविका से भी जुड़ा हुआ है।
परंपरागत रूप से प्रतिमा निर्माण की शुरुआत बंगाली कैलेंडर के चैत्र संक्रांति जैसे अवसरों के आसपास होने की बात कही जाती है। हालांकि, प्रतिमाओं के आकार, ऑर्डर और पूजा आयोजनों के अनुसार काम शुरू करने का समय अलग-अलग हो सकता है।
मूर्तिकार सबसे पहले देवी की प्रतिमा का मूल ढांचा तैयार करते हैं। इसके लिए बांस, लकड़ी और पुआल का इस्तेमाल किया जाता है। इस आधारभूत संरचना को बंगाली परंपरा में ‘काठामो’ कहा जाता है। पुआल को जूट की रस्सियों से बांधकर देवी के शरीर, हाथों और अन्य अंगों का प्रारंभिक आकार बनाया जाता है। यही ढांचा आगे चलकर मिट्टी की प्रतिमा का आधार बनता है।
मिट्टी की परतों से तैयार होता है देवी का स्वरूप
मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में मिट्टी का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है। पारंपरिक मूर्तिकला में अलग-अलग गुणों वाली मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। मिट्टी की बनावट, उसकी चिकनाई और मजबूती के आधार पर उसे प्रतिमा के अलग-अलग चरणों में लगाया जाता है।
पहला चरण: आधार तैयार करना
सबसे पहले पुआल से बने ढांचे पर अपेक्षाकृत खुरदरी और मजबूत मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है। इसका उद्देश्य ढांचे को ठोस रूप देना, खाली जगहों को भरना और प्रतिमा की मूल आकृति तैयार करना होता है। मिट्टी को हाथों से दबाकर देवी के शरीर और अन्य अंगों का प्रारंभिक आकार बनाया जाता है।
दूसरा चरण: बारीक मिट्टी का लेप
प्रारंभिक परत सूखने के बाद उस पर अधिक महीन और चिकनी मिट्टी लगाई जाती है। पारंपरिक प्रक्रिया में गंगा नदी के क्षेत्र से प्राप्त महीन मिट्टी सहित विभिन्न प्रकार की मिट्टियों का उपयोग किया जाता है। इससे प्रतिमा की सतह को चिकना बनाया जाता है और चेहरे, हाथों तथा अन्य अंगों की बारीक बनावट उभारी जाती है।
तीसरा चरण: अंतिम आकार और सुखाना
मिट्टी की परतों के बाद मूर्तिकार प्रतिमा के चेहरे, आंखों, नाक, होंठ, उंगलियों और आभूषणों की बारीकियों पर काम करते हैं। इसके बाद प्रतिमा को पर्याप्त समय तक सुखाया जाता है। मिट्टी पूरी तरह सूखने के बाद ही रंगाई और सजावट का काम किया जाता है।
मिट्टी के प्रकार और उसके इस्तेमाल का क्रम अलग-अलग कारीगरों तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार बदल सकता है। इसलिए प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया हर जगह बिल्कुल एक जैसी नहीं होती।
चक्षुदान: जब बनाई जाती हैं मां दुर्गा की आंखें
दुर्गा प्रतिमा निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक रस्मों में चक्षुदान का विशेष स्थान है। चक्षुदान का अर्थ है प्रतिमा की आंखें बनाना। इस प्रक्रिया में मूर्तिकार अत्यंत सावधानी से देवी की आंखों को अंतिम रूप देते हैं।
बंगाल में महालया का दिन पितृ पक्ष की समाप्ति और देवी पक्ष की शुरुआत से जुड़ा है। इस अवसर पर दुर्गा पूजा की तैयारियों में विशेष धार्मिक महत्व देखा जाता है। कई पारंपरिक कारीगर महालया के दिन चक्षुदान की रस्म निभाते हैं, हालांकि इसका समय परिवार, कारीगर और पूजा परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी की आंखें बनाने की यह प्रक्रिया प्रतिमा को जीवंत स्वरूप देने का प्रतीक मानी जाती है। आंखों की बनावट में थोड़ी-सी भी चूक देवी के चेहरे के पूरे भाव को बदल सकती है। इसलिए चक्षुदान के समय कारीगर पूरी एकाग्रता और श्रद्धा के साथ काम करते हैं।
शोला साज और डाक का साज से होता है शृंगार
मां दुर्गा की प्रतिमा का सौंदर्य केवल उसके आकार और रंगों तक सीमित नहीं होता। आभूषण, मुकुट, वस्त्र और सजावटी सामग्री भी प्रतिमा की भव्यता बढ़ाते हैं। पारंपरिक बंगाली दुर्गा पूजा में शृंगार की दो चर्चित शैलियां हैं—शोला साज और डाक का साज।
शोला साज: इसमें शोला नामक हल्के, सफेद और पौधों से प्राप्त पदार्थ का इस्तेमाल किया जाता है। इससे मुकुट, फूलों जैसी आकृतियां और अन्य सजावटी वस्तुएं तैयार की जाती हैं। इसकी हल्की बनावट और सफेद रंग प्रतिमा को विशिष्ट रूप देते हैं।
डाक का साज: इस शैली में चमकीली सजावटी सामग्री, धातु जैसी चमक वाले वर्क और बारीक अलंकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके नाम और विकास को औपनिवेशिक काल में डाक से आने वाली सजावटी सामग्री की परंपरा से जोड़ा जाता है। समय के साथ इस शैली में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और तकनीक में बदलाव आया है।
इन दोनों शैलियों के जरिए कारीगर अपनी पारंपरिक कला और रचनात्मकता का प्रदर्शन करते हैं। प्रतिमा का शृंगार पूजा आयोजकों की पसंद, बजट और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
पारंपरिक कला में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
लंबे समय तक दुर्गा प्रतिमा निर्माण के क्षेत्र में पुरुष कारीगरों की प्रमुख भूमिका रही है। हालांकि, अब महिलाएं भी इस पारंपरिक कला में अपनी पहचान बना रही हैं। चाइना पाल और काकोली पाल जैसी महिला कारीगरों का नाम इस क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के संदर्भ में लिया जाता है।
महिला कलाकार प्रतिमा निर्माण, आकार देने, रंगकारी और अन्य कलात्मक कार्यों में योगदान दे रही हैं। उनकी भागीदारी इस पारंपरिक पेशे में बदलते सामाजिक परिदृश्य को भी दर्शाती है। इससे कला के क्षेत्र में महिलाओं के कौशल और रचनात्मकता को नए अवसर मिल रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण के लिए बढ़ रहा इको-फ्रेंडली प्रतिमाओं का चलन
दुर्गा पूजा के बाद प्रतिमाओं का विसर्जन एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है। हालांकि, प्रतिमाओं में इस्तेमाल होने वाली कुछ सामग्रियों के कारण नदियों और अन्य जलस्रोतों में प्रदूषण की समस्या भी सामने आती रही है। प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी), प्लास्टिक आधारित सजावट और कुछ सिंथेटिक रंग पानी की गुणवत्ता तथा जलीय पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
इस चुनौती को देखते हुए प्राकृतिक मिट्टी, कम हानिकारक रंगों और पर्यावरण के अनुकूल सजावटी सामग्री से प्रतिमाएं बनाने पर जोर दिया जा रहा है। प्राकृतिक चिकनी मिट्टी से बनी प्रतिमाओं को पारंपरिक विकल्पों में गिना जाता है। हालांकि, पर्यावरण पर वास्तविक प्रभाव प्रतिमा में इस्तेमाल की गई सभी सामग्रियों और विसर्जन की व्यवस्था पर निर्भर करता है।
प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल: पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाओं में पौधों से प्राप्त रंगों तथा कम हानिकारक रंगों को प्राथमिकता दी जा सकती है। इससे कुछ हानिकारक रसायनों के जलस्रोतों में पहुंचने का जोखिम कम करने में मदद मिलती है।
प्राकृतिक बाइंडर: रंगों को प्रतिमा की सतह पर टिकाने के लिए इमली के बीजों से बने पारंपरिक बाइंडर जैसे विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है। इससे कुछ रासायनिक सामग्रियों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जाता है।
कृत्रिम विसर्जन कुंड: कई स्थानों पर नदियों और प्राकृतिक जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए निर्धारित कृत्रिम तालाबों या विसर्जन कुंडों में प्रतिमाओं का विसर्जन कराया जाता है। विसर्जन के बाद फूलों और अन्य पूजन सामग्री को अलग करके उनका उचित निस्तारण किया जा सकता है। पानी और ठोस कचरे के प्रबंधन की प्रभावशीलता स्थानीय व्यवस्था पर निर्भर करती है।
पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा का अर्थ केवल मिट्टी का इस्तेमाल करना नहीं है। रंग, सजावट, प्रतिमा के ढांचे और विसर्जन के बाद कचरे के प्रबंधन को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल है कोलकाता की दुर्गा पूजा
कोलकाता की दुर्गा पूजा को वर्ष 2021 में यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया था। यह मान्यता दुर्गा पूजा से जुड़ी सामुदायिक भागीदारी, कलात्मक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं के महत्व को रेखांकित करती है।
दुर्गा प्रतिमाओं का निर्माण इस उत्सव का अहम हिस्सा है। इसमें मूर्तिकारों की पीढ़ियों से चली आ रही तकनीक, स्थानीय सामग्री, धार्मिक आस्था और कलात्मक कल्पनाशीलता एक साथ दिखाई देती हैं।
आस्था, कला और परंपरा का अनूठा संगम
मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार करने की प्रक्रिया केवल मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं है। बांस और पुआल से ढांचा बनाने, मिट्टी की परतें चढ़ाने, प्रतिमा को सुखाने, रंगने, शृंगार करने और चक्षुदान तक हर चरण में कारीगरों का कौशल और अनुभव महत्वपूर्ण होता है।
शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान भक्त जिस भव्य प्रतिमा के दर्शन करते हैं, उसके पीछे महीनों की मेहनत और पारंपरिक कला की लंबी विरासत होती है। वहीं, पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों और बेहतर विसर्जन व्यवस्थाओं को अपनाने से इस सांस्कृतिक परंपरा को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाने का अवसर भी मिलता है।

