Home » धर्म-कर्म » समुद्र मंथन से जुड़ी है अनंत चतुर्दशी की कथा, पंचामृत में भगवान को खोजने की निभाई जाती है रस्म

समुद्र मंथन से जुड़ी है अनंत चतुर्दशी की कथा, पंचामृत में भगवान को खोजने की निभाई जाती है रस्म

Facebook
Twitter
WhatsApp

नई दिल्ली। अनंत चतुर्दशी का पर्व भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सुख, शांति, धन और समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि इसके साथ समुद्र मंथन, भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप और पांडवों से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं।

इस पर्व पर देश के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह की धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं। इन्हीं में एक विशेष परंपरा पंचामृत में अनंत भगवान को खोजने की है। पूजा के दौरान अनंत भगवान को खीरे में बांधकर दूध, दही, घी, मधु और शक्कर से तैयार पंचामृत में रखा जाता है। इसके बाद श्रद्धालु पंचामृत में भगवान को खोजने की रस्म निभाते हैं। धार्मिक मान्यता में इस परंपरा को समुद्र मंथन से जोड़कर देखा जाता है।

समुद्र मंथन से जुड़ी है अनंत चतुर्दशी की धार्मिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन देवताओं और राक्षसों के बीच हुआ था। समुद्र मंथन से अनेक बहुमूल्य वस्तुओं के साथ अमृत और विष का कलश भी निकला था। धार्मिक कथाओं में अमृत का संबंध भगवान विष्णु से और विष का संबंध भगवान महादेव से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु के हाथों में अमृत का कलश आया, जबकि संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने विष का पान किया। इसके बाद देवताओं और समस्त संसार के लिए खुशहाली की शुरुआत मानी गई। इसी धार्मिक परंपरा और मान्यता को अनंत चतुर्दशी के पर्व से भी जोड़कर देखा जाता है।

ALSO READ THIS :  मनुस्मृति पर राहुल गांधी के बयान से नाराज शंकराचार्य, बोले माफी नहीं मांगी तो कांग्रेस के खिलाफ चलाएंगे हिंदू बहिष्कार अभियान

अनंत रूप में भगवान विष्णु की आराधना

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु अनंत स्वरूप में प्रकट हुए थे। भक्तों की रक्षा और उनके जीवन में सुख समृद्धि बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु की अनंत रूप में पूजा किए जाने की परंपरा चली आ रही है।

इसी कारण इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा करने के बाद अनंत सूत्र को अपनी बांह पर धारण करते हैं और भगवान विष्णु से परिवार की सुख शांति तथा संकटों से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।

चौदह गांठों वाले अनंत सूत्र का क्या है महत्व

अनंत चतुर्दशी की पूजा में विशेष डोरी को अनंत कहा जाता है। इस अनंत सूत्र में चौदह गांठें लगाई जाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार ये चौदह गांठें भगवान विष्णु के चौदह स्वरूपों का प्रतीक मानी जाती हैं। पूजा के दौरान भगवान विष्णु के नामों का स्मरण करते हुए अनंत सूत्र धारण किया जाता है।

परंपरा के अनुसार पुरुष अनंत सूत्र को दाहिनी बांह में और महिलाएं बाईं बांह में धारण करती हैं। इसे रक्षा कवच के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि चौदह गांठों वाला यह सूत्र भक्तों को संकटों से बचाने और जीवन में सुख समृद्धि बनाए रखने का प्रतीक है। इन चौदह गांठों का संबंध चौदह लोकों से भी जोड़ा जाता है।

भगवान विष्णु के चौदह नामों का किया जाता है स्मरण

अनंत सूत्र की चौदह गांठों को भगवान विष्णु के विभिन्न नामों से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपरा में अनंत, ऋषिकेश, पद्मनाभ, माधव, वैकुंठ, श्रीधर, मधुसूदन, वामन, त्रिविक्रम, केशव, नारायण, दामोदर, गोविंद और अन्य विष्णु स्वरूपों का स्मरण किया जाता है।

ALSO READ THIS :  हरियाली अमावस्या पर शिव आराधना और दान-पुण्य का विशेष महत्व, रात में लगेगा साल का आखिरी पूर्ण सूर्य ग्रहण

पूजा के दौरान इन नामों का उच्चारण करते हुए अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा है। भक्तों का विश्वास है कि इससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख, शांति तथा समृद्धि बनी रहती है।

चौदह वर्षों तक अनंत फल की मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी के दिन श्रद्धा और विधि-विधान के साथ भगवान विष्णु की पूजा तथा व्रत करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता भी है कि इस व्रत का प्रभाव चौदह वर्षों तक बना रहता है।

पौराणिक कथाओं में महाभारत काल का भी उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार पांडवों ने विपरीत परिस्थितियों के दौरान अनंत चतुर्दशी का व्रत किया था। भगवान विष्णु की आराधना और अनंत व्रत के प्रभाव से उन्हें अपना खोया हुआ राजपाट वापस प्राप्त हुआ। इसी कथा के कारण भी इस व्रत को संकटों से मुक्ति और खोई हुई समृद्धि की वापसी से जोड़कर देखा जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को बताया था व्रत का महत्व

धार्मिक कथाओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी के व्रत की महिमा भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को बताई थी। मान्यता है कि जब पांडव कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत भगवान की पूजा और व्रत करने का मार्ग बताया।

पांडवों ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन किया। इसके बाद अनंत चतुर्दशी की पूजा और व्रत की परंपरा आगे बढ़ती चली गई। आज भी श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा कर परिवार की सुख शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

अंक शास्त्र में भी चौदह अंक का विशेष महत्व

अनंत चतुर्दशी की धार्मिक मान्यताओं के साथ अंक शास्त्र में भी चौदह अंक का उल्लेख मिलता है। अंक शास्त्र के अनुसार चौदह का योग पांच होता है। एक और चार को जोड़ने पर पांच अंक प्राप्त होता है।

ALSO READ THIS :  अष्टमी तिथि में बन रहा अभिजीत मुहूर्त, जानें राहुकाल और दिशाशूल का समय

अंक शास्त्र में पांच अंक का संबंध बुध ग्रह से माना जाता है। बुध को बुद्धि, संवाद, तर्क, व्यापार और गणना का कारक माना गया है। इसी वजह से अनंत चतुर्दशी से जुड़े चौदह अंक को अंक शास्त्र की मान्यताओं में भी विशेष महत्व दिया जाता है।

आस्था, परंपरा और समुद्र मंथन की कथा का संगम

अनंत चतुर्दशी का पर्व धार्मिक आस्था, पौराणिक कथाओं और सदियों पुरानी परंपराओं का संगम माना जाता है। एक ओर जहां भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है, वहीं दूसरी ओर अनंत सूत्र धारण करने और पंचामृत में भगवान को खोजने जैसी परंपराएं इस पर्व को विशिष्ट बनाती हैं।

समुद्र मंथन से जुड़ी मान्यताओं से लेकर पांडवों की कथा और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए व्रत के महत्व तक, अनंत चतुर्दशी की धार्मिक परंपरा में भगवान विष्णु की आराधना और संकटों से रक्षा की कामना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। यही कारण है कि श्रद्धालु इस दिन पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ अनंत भगवान की पूजा करते हैं।

[wonderplugin_slider id=1]

टॉप स्टोरी

ज़रूर पढ़ें