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26 सितंबर से शुरू होगा पितृ पक्ष, जानिए क्यों कौवे को कराया जाता है श्राद्ध का भोजन

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नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यह समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का पर्व माना जाता है। इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध और पितृ पक्ष के रूप में माना जाता है।

पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से श्राद्ध कर्म करने से पितरों को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है। इसी दौरान कौवे को भोजन कराने की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसका संबंध धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं से जोड़ा जाता है।

कौवे को भोजन कराने की क्या है मान्यता

पितृ पक्ष में श्राद्ध का भोजन तैयार करने के बाद उसका एक हिस्सा कौवे के लिए निकालने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि कौवा श्राद्ध के भोजन को ग्रहण कर लेता है तो इसे इस बात का संकेत माना जाता है कि पितरों ने भी भोजन स्वीकार कर लिया है।

मान्यता है कि पितरों के लिए तैयार किए गए भोजन में से कौवे, गाय, कुत्ते, चींटी और देवताओं के लिए भोग निकालना चाहिए। धार्मिक विश्वास के अनुसार पितर इन विभिन्न रूपों में धरती पर आकर अपने परिजनों का अर्पण स्वीकार करते हैं।

यमराज के संदेशवाहक से जुड़ी है मान्यता

गरुड़ पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में कौवे को यमराज का संदेशवाहक बताए जाने की धार्मिक मान्यता मिलती है। इसी विश्वास के आधार पर पितृ पक्ष में कौवे को भोजन कराने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है।

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धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज कौवे का रूप धारण करके धरती पर आते हैं और परिवार की ओर से अर्पित भोजन को स्वीकार करते हैं। यह भी माना जाता है कि कौवे द्वारा ग्रहण किया गया श्राद्ध का भोजन पितरों तक पहुंचता है और उनकी आत्मा को शांति मिलती है।

इसी कारण श्राद्ध कर्म करने वाले परिवारों में कौवे के आने और भोजन ग्रहण करने को शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है। मान्यता यह भी है कि कौवे को भोजन कराने से यमराज प्रसन्न होते हैं और पितरों का आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है।

भगवान श्रीराम और जयंत से जुड़ी पौराणिक कथा

कौवे को श्राद्ध का भोजन कराने की परंपरा के पीछे एक पौराणिक कथा भी बताई जाती है। कथा के अनुसार भगवान इंद्र के पुत्र जयंत ने एक बार कौवे का रूप धारण किया और पृथ्वी पर आए। उन्होंने माता सीता के पैरों में चोंच मार दी, जिससे उनके पैर से रक्त निकल आया।

माता सीता को कष्ट पहुंचाने की घटना से भगवान श्रीराम क्रोधित हुए। उन्होंने एक तिनके को बाण का रूप देकर जयंत पर चला दिया। बाण से बचने के लिए जयंत तीनों लोकों में गए और सहायता मांगने का प्रयास किया, लेकिन किसी ने उनकी सहायता नहीं की।

अंत में जयंत वापस भगवान श्रीराम और माता सीता के पास लौटे और उनसे क्षमा मांगी। धार्मिक कथा के अनुसार भगवान श्रीराम ने उन्हें क्षमा कर दिया और वरदान दिया कि पितृ पक्ष के दौरान कौवों को अर्पित किया जाने वाला भोजन पितरों तक पहुंचेगा।

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धार्मिक मान्यता में इसी कथा को पितृ पक्ष में कौवों को भोजन कराने की परंपरा से जोड़ा जाता है। हालांकि यह धार्मिक आस्था और पौराणिक परंपरा का विषय है।

पितृ दोष और कालसर्प दोष को लेकर भी मान्यता

पितृ पक्ष के दौरान कौवे को भोजन कराने को लेकर कई अन्य धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। इनमें कुंडली में बताए जाने वाले पितृ दोष और कालसर्प दोष को शांत करने की मान्यता भी शामिल है।

मान्यता के अनुसार पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्राद्ध कर्म के साथ कौवों को भोजन कराया जाता है। ऐसा करने से परिवार में सुख, समृद्धि और आरोग्यता बनी रहने की धार्मिक मान्यता है।

श्राद्ध के भोजन में किन चीजों का होता है इस्तेमाल

कौवे को भोजन अर्पित करने के लिए भी एक विशेष धार्मिक विधि बताई गई है। मान्यता के अनुसार उड़द की दाल, चावल और गुड़ से प्रसाद तैयार किया जाता है। श्राद्ध कर्म और तर्पण की प्रक्रिया के बाद इस भोजन को तर्पण स्थल पर रखा जाता है और कौवे को अर्पित किया जाता है।

कई परिवारों में श्राद्ध के भोजन से अलग कौवे, गाय, कुत्ते और अन्य जीवों के लिए भी भोजन निकाला जाता है। इसके पीछे जीवों के प्रति सम्मान और सभी प्राणियों में ईश्वर के दर्शन की धार्मिक भावना को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

पितृ पक्ष में श्रद्धा और स्मरण का महत्व

पितृ पक्ष को केवल कर्मकांड के रूप में नहीं बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के अवसर के तौर पर भी देखा जाता है। परिवार अपने दिवंगत सदस्यों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध और दान जैसे धार्मिक कार्य करते हैं।

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धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कौवे को भोजन कराने की परंपरा इसी व्यापक धार्मिक विश्वास का हिस्सा है, जिसमें प्रकृति, जीव-जंतुओं और पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना जुड़ी हुई है।

पितृ पक्ष के दौरान अलग-अलग परिवार अपनी परंपरा और मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं। कौवे को भोजन कराने की परंपरा भी इन्हीं प्राचीन धार्मिक मान्यताओं में से एक है, जिसे आज भी बड़ी संख्या में लोग श्रद्धा के साथ निभाते हैं।

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