नई दिल्ली। सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना, जलाभिषेक और भक्ति का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान देशभर के करोड़ों श्रद्धालु शिवालयों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन शिवभक्ति के बीच एक ऐसा रहस्य भी है, जिसने वर्षों से इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं की उत्सुकता बढ़ा रखी है। यह दावा किया जाता है कि उत्तराखंड के केदारनाथ से लेकर तमिलनाडु के रामेश्वरम तक भगवान शिव के सात प्रमुख मंदिर लगभग 79 डिग्री पूर्व देशांतर के आसपास एक ही अक्ष पर स्थित हैं। इस कथित “शिव शक्ति अक्ष” को लेकर आस्था और जिज्ञासा दोनों बनी हुई हैं।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह दावा व्यापक रूप से लोकप्रिय धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता है, लेकिन इसे लेकर वैज्ञानिक और पुरातात्विक समुदाय में पूर्ण सहमति नहीं है। इन मंदिरों के देशांतर एक-दूसरे के काफी निकट हैं, लेकिन वे पूरी तरह एक ही सीधी रेखा पर स्थित नहीं हैं।
पंचतत्व और शिव शक्ति से जुड़ी है इन मंदिरों की मान्यता
मान्यता के अनुसार इस विशेष अक्ष में शामिल प्रमुख शिव मंदिर हैं केदारनाथ, श्रीकालाहस्ती, एकाम्बरेश्वर, अरुणाचलेश्वर, जम्बूकेश्वर, थिल्लई नटराज और रामेश्वरम। इनमें से दक्षिण भारत के पांच मंदिरों को पंचभूत स्थलम भी माना जाता है, जो प्रकृति के पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
श्रीकालाहस्ती को वायु तत्व, एकाम्बरेश्वर को पृथ्वी तत्व, जम्बूकेश्वर को जल तत्व, अरुणाचलेश्वर को अग्नि तत्व और थिल्लई नटराज को आकाश तत्व का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि ये मंदिर भगवान शिव की दिव्य ऊर्जा के विभिन्न स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
उज्जैन का खगोलीय महत्व भी बढ़ाता है रहस्य
प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में उज्जैन का विशेष स्थान रहा है। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन भारत में समय और ग्रह-नक्षत्रों की गणना के लिए उज्जैन एक प्रमुख केंद्र था। अनेक प्राचीन ग्रंथों में इसे महत्वपूर्ण खगोलीय नगर के रूप में वर्णित किया गया है। यही कारण है कि उज्जैन को कभी-कभी “भारत का ग्रीनविच” भी कहा जाता है।
हालांकि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार शून्य देशांतर (Prime Meridian) इंग्लैंड के ग्रीनविच से गुजरता है। वहीं प्राचीन भारतीय गणनाओं में उज्जैन का उपयोग एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु के रूप में किया जाता था, लेकिन उसे आधुनिक अर्थों में वैश्विक “ज़ीरो लॉन्गिट्यूड” नहीं माना जाता।
सातों मंदिरों का धार्मिक महत्व
केदारनाथ (लगभग 79.07°E)
उत्तराखंड के हिमालय में स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक। मान्यता है कि पांडवों ने इसकी स्थापना कराई और बाद में आदि शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार कराया।
श्रीकालाहस्ती (लगभग 79.70°E)
आंध्र प्रदेश का प्रसिद्ध शिव मंदिर, जिसे वायु तत्व का प्रतीक माना जाता है। राहु-केतु दोष की पूजा के लिए यह विश्व प्रसिद्ध है।
एकाम्बरेश्वर (लगभग 79.42°E)
तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित यह मंदिर पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है और दक्षिण भारत के प्रमुख शिव मंदिरों में गिना जाता है।
अरुणाचलेश्वर (लगभग 79.07°E)
तिरुवन्नामलाई स्थित यह मंदिर अग्नि तत्व का प्रतीक माना जाता है और कार्तिक दीपम महोत्सव के लिए प्रसिद्ध है।
जम्बूकेश्वर (लगभग 79.07°E)
तिरुचिरापल्ली के निकट स्थित यह मंदिर जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी विशेषता यह है कि गर्भगृह के समीप प्राकृतिक जल का स्रोत निरंतर बना रहता है।
थिल्लई नटराज (लगभग 79.69°E)
चिदंबरम स्थित यह मंदिर भगवान शिव के नटराज स्वरूप को समर्पित है और आकाश तत्व का प्रतीक माना जाता है।
रामेश्वरम (लगभग 79.31°E)
तमिलनाडु में स्थित यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने लंका प्रस्थान से पूर्व यहां शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी।
आस्था और विज्ञान दोनों का विषय
इन सात मंदिरों के लगभग समान देशांतर पर स्थित होने को लेकर वर्षों से चर्चा होती रही है। कई लोग इसे प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण मानते हैं, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं कि इन सभी मंदिरों की स्थापना किसी एक नियोजित सीधी रेखा के आधार पर की गई थी।
फिर भी यह निर्विवाद है कि भारत के ये प्राचीन शिव मंदिर अपनी स्थापत्य कला, धार्मिक महत्व, सांस्कृतिक विरासत और खगोलीय परंपराओं के कारण विश्वभर के श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। सावन के पावन अवसर पर इन मंदिरों की महिमा श्रद्धालुओं की आस्था को और अधिक गहरा कर देती है।



