कभी मुठभेड़ की तारीख गलत, कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस का बुलावा समय निकलने के बाद; अब दुष्कर्म और प्रयास के कानूनी अंतर में उलझी पुलिस की विज्ञप्ति! तथ्यों की नसीहत देने वाले महकमे से सवाल, प्रेस नोट जांचता कौन है?
अमित सैनी, प्रधान संपादक की कलम से…
मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस आजकल गजब के कारनामे कर रही है। अपराधियों को मुंह से ‘धांय-धांय’ करके जवाब देने वाले पुलिस महकमे की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों में अब कानून की धाराओं का ही एनकाउंटर होता दिखाई दे रहा है। कभी दो बजे की प्रेस कॉन्फ्रेंस का निमंत्रण दो बजकर एक मिनट पर भेजा जा रहा है, तो कभी रात में हुई मुठभेड़ की तारीख विज्ञप्ति में बदल जाती है। अब ताजा कारनामा इससे भी गंभीर है। नाबालिग से जुड़े एक आपराधिक मामले में पुलिस ने ‘दुष्कर्म के प्रयास’ के आरोपी को सीधे ‘दुष्कर्म का दोषी’ बना दिया, जबकि विज्ञप्ति में दर्ज IPC की धारा 376/511 स्पष्ट रूप से ‘दुष्कर्म के प्रयास’ की ओर इशारा करती है। सवाल है कि पुलिस की मीडिया सेल को ‘दुष्कर्म’ और ‘दुष्कर्म के प्रयास’ का कानूनी अंतर भी मालूम है या नहीं?
‘ऑपरेशन कन्विक्शन’ का हल्ला, मगर जानकारी में झोल!
शुक्रवार, 9 अक्टूबर की शाम मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस की मीडिया सेल ने ऑपरेशन कन्विक्शन के तहत ऑफिशियल व्हाट्सएप ग्रुप पर एक प्रेस नोट जारी किया। इसकी हेडलाइन में ही दावा किया गया कि नाबालिग से दुष्कर्म करने वाले आरोपी विकास और उसकी सहयोगी ललिता को अदालत ने 10-10 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। मामला फुगाना थाना क्षेत्र का है, जिसमें 29 मई 2019 को मुकदमा दर्ज हुआ था। लेकिन विज्ञप्ति में मुकदमे और सजा की धाराएं पढ़ते ही पुलिस की आधिकारिक जानकारी पर सवाल खड़े हो जाते हैं!

कागजी धाराओं का गणित: धारा 376 के संग 511 का पेच
दरअसल, भारतीय दंड संहिता की धारा 376 दुष्कर्म के अपराध की सजा से संबंधित है, जबकि धारा 511 अपराध के प्रयास से जुड़ी है। धारा 376 के साथ 511 का इस्तेमाल सामान्यतः दुष्कर्म के प्रयास के मामलों में होता है। पुलिस की विज्ञप्ति में विकास को धारा 376, 511 और 120बी के साथ पॉक्सो एक्ट की धारा 7/8 में सजा सुनाए जाने की जानकारी दी गई है। इसके बावजूद हेडलाइन से लेकर घटनाक्रम तक आरोपी को दुष्कर्म करने वाला बताया गया है।
प्रयास या अपराध? खाकी के विरोधाभास में उलझा फैसला
अब सवाल सीधा है। यदि अदालत ने आरोपी को धारा 376/511 के तहत दोषी ठहराया है, तो पुलिस ने उसे सीधे दुष्कर्म का दोषी कैसे घोषित कर दिया? और यदि अदालत ने पूर्ण दुष्कर्म के अपराध में दोषसिद्धि की है, तो धारा 511 का उल्लेख किस आधार पर किया गया? हालांकि, दोनों धाराओं का एक साथ लिखा होना अपने आप में कानूनी गलती नहीं है। वास्तविक दोषसिद्धि और सजा का आधार अदालत के लिखित फैसले से ही स्पष्ट होगा। मगर पुलिस की विज्ञप्ति में अपराध की प्रकृति को लेकर यह विरोधाभास निश्चित रूप से स्पष्टीकरण मांगता है।
गायब होती धाराएं: कहां गुम हो गई आईपीसी की 506?
इतना ही नहीं, शुरुआती मुकदमे में धारा 506 का उल्लेख है, लेकिन विज्ञप्ति में अदालत के फैसले का विवरण देते समय यह धारा गायब है। यह संभव है कि सुनवाई के दौरान कुछ धाराओं में दोषसिद्धि नहीं हुई हो, लेकिन प्रेस नोट में इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। पुलिस ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि अदालत ने किन आरोपों को साबित माना और किन धाराओं में आरोपियों को दोषमुक्त किया, यदि ऐसा हुआ हो।

वक्त का एनकाउंटर: 2 बजे के बुलावे की चिट्ठी 2:01 बजे!
मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस की आधिकारिक सूचनाओं में लापरवाही का यह पहला मामला नहीं है। हाल ही में दोपहर दो बजे आयोजित होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए पत्रकारों को दो बजकर एक मिनट पर निमंत्रण भेजा गया। यानी जब पत्रकारों को बुलाने का संदेश पहुंचा, तब तक प्रेस कॉन्फ्रेंस का निर्धारित समय निकल चुका था। पुलिस की मीडिया व्यवस्था की समयबद्धता पर सवाल उठाने के लिए यह उदाहरण अपने आप में काफी है।
तारीख में झोल: रात की मुठभेड़ और तारीखों की बाजीगरी!
इससे कुछ दिन पहले सिविल लाइन थाना क्षेत्र में हुई मुठभेड़ की विज्ञप्ति में भी तारीख को लेकर गड़बड़ी सामने आई थी। एक अक्टूबर की रात करीब 11:20 बजे हुई मुठभेड़ के बाद रात करीब 12:51 बजे पुलिस के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में विज्ञप्ति पोस्ट की गई। इसमें एक अक्टूबर की मुठभेड़ को ‘दो अक्टूबर की मध्य रात्रि’ बताया गया था। रात 12 बजे के बाद प्रेस नोट जारी होना अलग बात है, लेकिन घटना की वास्तविक तारीख और समय को स्पष्ट रखना पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड की बुनियादी जरूरत है।

नसीहत और विडंबना: कप्तान साहब की सीख, शाम को वही चूक!
अब सबसे दिलचस्प बात यह है कि मुज़फ़्फ़रनगर के नए SSP सूरज राय ने शुक्रवार को ही मीडिया से बातचीत में पत्रकारों को नसीहत दी कि खबरों को सनसनीखेज बनाने के लिए तथ्यों से खिलवाड़ न किया जाए। उनकी यह बात उचित है, लेकिन उसी दिन पुलिस की मीडिया सेल से जारी विज्ञप्ति में अपराध की प्रकृति को लेकर अस्पष्टता सामने आना अपने आप में विडंबना है। इतना ही नहीं, दोपहर को आयोजित हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस मीडिया सेल की खामियों का भी मुद्दा उठा था, लेकिन शाम को ये विज्ञप्ति ज़ारी हो गई, जो अपने आप में घोर लापरवाही की घोतक है!
तथ्यों की कतरन: आखिर प्रेस नोट जांचने का जिम्मेदार कौन?
सवाल उठता है कि पत्रकारों को तथ्यात्मकता का पाठ पढ़ाने वाले पुलिस महकमे में आधिकारिक विज्ञप्तियों की तथ्यात्मक जांच की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
ऑपरेशन कन्विक्शन के तहत अदालत से दोषियों को सजा दिलाना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन अदालत का फैसला और पुलिस की उपलब्धि बताने वाली प्रेस विज्ञप्ति दो अलग चीजें हैं। अदालत के निर्णय को सही ढंग से प्रस्तुत करना पुलिस की जिम्मेदारी है। यदि अपराध दुष्कर्म के प्रयास का था, तो उसे पूर्ण दुष्कर्म बताना गलत धारणा पैदा कर सकता है। इसी तरह यदि दोषसिद्धि किसी अन्य कानूनी आधार पर हुई है, तो उसका स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए।

जल्दबाजी या अनभिज्ञता? पुलिस मीडिया सेल की साख पर सवाल
लगातार सामने आ रही इन चूकों से पुलिस की मीडिया सेल में कानूनी जानकारी, दस्तावेजों की जांच और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या प्रेस नोट तैयार करने वालों को संबंधित धाराओं की पर्याप्त समझ है? क्या अदालत के आदेश से उसका मिलान किया जाता है? क्या विज्ञप्ति जारी करने से पहले कोई वरिष्ठ अधिकारी उसे पढ़ता है? या फिर बस उपलब्धि गिनाने की जल्दबाजी में संदेश आधिकारिक ग्रुप पर भेज दिया जाता है?
साख का सवाल: केवल बंदूक से नहीं, सही तथ्यों से बनती है छवि
मुंह से ‘धांय-धांय’ करने वाली मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस को अब अपनी प्रेस विज्ञप्तियों पर भी थोड़ा निशाना साधने की जरूरत है। अपराधियों पर कार्रवाई कीजिए, लेकिन कानून की धाराओं को तो बख्श दीजिए। क्योंकि पुलिस की साख सिर्फ अपराधियों की गिरफ्तारी और अदालत से सजा दिलाने में नहीं, बल्कि जनता के सामने सही तथ्य रखने में भी है।

