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स्वरा भास्कर के जौहर वाले बयान पर मौलाना साजिद रशीदी बोले, ‘जौहर करना बहादुरी नहीं’; रानी लक्ष्मीबाई का दिया उदाहरण

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नई दिल्ली। अभिनेत्री स्वरा भास्कर के जौहर से जुड़े बयान पर मौलाना साजिद रशीदी की प्रतिक्रिया सामने आई है। रशीदी ने जौहर को बहादुरी मानने से इनकार करते हुए कहा कि असली बहादुरी दुश्मन से लड़ते हुए अपनी जान देना या दुश्मन का मुकाबला करना है। उन्होंने कहा कि देश में कई ऐसी बहादुर नारियां रही हैं, जिन्होंने लड़ते-लड़ते अपने प्राण गंवाए और उन्हें उनकी वीरता के लिए याद किया जाता है।

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स्वरा भास्कर ने बयान पर मांगी है माफी

मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि स्वरा भास्कर अपने बयान को लेकर क्षमा मांग चुकी हैं। उन्होंने कहा कि इस पूरे विषय को समझने के लिए पद्मावत की कहानी और उसके लिखे जाने के समय को ध्यान में रखना जरूरी है।

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रशीदी ने दावा किया कि पद्मावत की कहानी कई सदियों बाद लिखी गई और इसे सीधे तौर पर धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने जौहर को एक प्रथा बताते हुए इसकी तुलना सती प्रथा से की और कहा कि उनके अनुसार जौहर रानी पद्मावत से शुरू हुआ और वहीं समाप्त हो गया।

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‘जौहर बहादुरी की बात नहीं’

मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि उनके अनुसार जौहर को बहादुरी के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बहादुरी यह है कि कोई व्यक्ति लड़ते-लड़ते दुश्मन का सामना करे और या तो दुश्मन की जान ले या अपनी जान दे।

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उन्होंने देश की उन महिलाओं का उदाहरण दिया, जिन्होंने युद्ध के मैदान में लड़ते हुए अपने प्राण गंवाए। रशीदी ने कहा कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में ऐसी बहुत सी महिलाएं रही हैं, जिन्होंने अपनी बहादुरी का परिचय दिया और आज भी उन्हें याद किया जाता है।

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रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देकर रखी बात

रशीदी ने रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने लड़ते-लड़ते अपनी जान दे दी। उन्होंने सवाल किया कि क्या रानी लक्ष्मीबाई बहादुर नहीं थीं। इसी उदाहरण के जरिए उन्होंने जौहर को बहादुरी से अलग बताया।

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उन्होंने कहा कि उस दौर में कुछ दरबारी शायर भी हुआ करते थे, जिनका काम बादशाहों और रानियों की प्रशंसा करना और घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना होता था।

‘धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए’

मौलाना ने कहा कि उन्होंने वेद और रामायण पढ़ी है और उनके अनुसार इनमें जौहर जैसी किसी परंपरा का उल्लेख नहीं मिलता। उन्होंने सती प्रथा का भी जिक्र करते हुए कहा कि वह एक सामाजिक प्रथा थी और उसका धर्म से संबंध नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

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उन्होंने कहा कि सती प्रथा का समाप्त होना अच्छी बात है और उनके अनुसार धार्मिक चीजें अमर तथा अटल होती हैं, जबकि समाज में समय के साथ जुड़ने वाली कुछ प्रथाएं बाद में समाप्त हो जाती हैं।

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दुष्कर्म पीड़िताओं के संदर्भ में स्वरा की बात का किया जिक्र

साजिद रशीदी ने स्वरा भास्कर के बयान के एक अन्य हिस्से का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वरा की ओर से एक बात अच्छी कही गई थी कि यदि कोई महिला दुष्कर्म की पीड़िता होने के बावजूद जीवित है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह कायर है या उसे जीने का अधिकार नहीं है।

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हालांकि, इस मुद्दे पर रशीदी ने ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर कई दावे भी किए और कहा कि उनके अनुसार ऐसे मामलों को लेकर इतिहास में अलग-अलग तरह की बातें कही जाती रही हैं।

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पद्मावत और अलाउद्दीन खिलजी को लेकर रशीदी की टिप्पणी

मौलाना साजिद रशीदी ने रानी पद्मावत और अलाउद्दीन खिलजी से जुड़ी कथा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रानी पद्मावत की सुंदरता के बारे में सुनकर अलाउद्दीन खिलजी के उनके प्रति आकर्षित होने और उनके लिए युद्ध करने की बात कही जाती है।

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उन्होंने दावा किया कि यदि खिलजी रानी को पकड़ लेता तो उसे हरम में रखा जाता। रशीदी ने मुगल बादशाहों के हरम में हिंदू रानियों के होने का भी दावा किया और कहा कि इसे आस्था से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

‘मुस्लिम बादशाहों ने हिंदू रानियों के साथ दुष्कर्म नहीं किया’

रशीदी ने कहा कि मुस्लिम बादशाहों ने यदि हिंदू शासकों को पराजित भी किया तो उनकी रानियों के साथ दुष्कर्म नहीं किया। उन्होंने इस संदर्भ में ऐतिहासिक घटनाओं को अपने नजरिए से प्रस्तुत किया और कहा कि इन विषयों को धार्मिक नजरिये से देखने के बजाय इतिहास के संदर्भ में समझना चाहिए।

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इन ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस बातचीत में उपलब्ध नहीं है।

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मलिक मोहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ का किया उल्लेख

मौलाना साजिद रशीदी ने मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जायसी ने पद्मावत की गाथा को अपने शायराना अंदाज में लिखा था, जिसे लोगों ने लंबे समय तक रुचि के साथ सुना और पढ़ा।

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उन्होंने कहा कि उस दौर में दरबारी कवियों और शायरों की भूमिका भी अलग थी और वे कई घटनाओं को अपनी शैली में प्रस्तुत करते थे। उनके मुताबिक इसी वजह से ऐतिहासिक कथाओं और उनके साहित्यिक रूप को अलग-अलग संदर्भों में समझना जरूरी है।

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‘कुरान की बात करने पर मुसलमानों को महिलाओं के खिलाफ बताया जाता है’

रशीदी ने कहा कि आज यदि कोई मुसलमान कुरान की बात करता है तो उसे महिलाओं के खिलाफ बताए जाने की कोशिश की जाती है। उन्होंने जौहर और महिलाओं की बहादुरी से जुड़े विवाद को इसी व्यापक बहस के संदर्भ में रखा।

स्वरा भास्कर के जौहर संबंधी बयान के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है और इस पर अलग-अलग पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

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